सुरेंंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
Key Line Times
बोरावड़, डीडवाना-कुचामण (राजस्थान) ,जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के आध्यात्मिक आलोक से पूरी बोरावड़ नगरी आलोकित हो रही है। बोरावड़ की धरा पर त्रिदिवसीय प्रवास में वर्धमान महोत्सव का महनीय आयोजन भी प्रारम्भ हो गया है। इस सौभाग्य को प्राप्त कर बोरावड़वासी हर्षविभोर बने हुए हैं। जन-जन का उत्साह मानों अपने चरम पर है। बोरावड़ के लिए तो यह प्रथम ही अवसर है, जहां तेरापंथ धर्मसंघ का ऐसा महनीय आयोजन तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य की मंगल सन्निधि में समायोजित हो रहा है। शुक्रवार को बोरावड़ प्रवास व वर्धमान महोत्सव का दूसरे दिन कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय परिसर में बने भव्य प्रवचन पण्डाल में श्रद्धालु जनता युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के पदार्पण से पूर्व ही बड़ी संख्या में उपस्थित हो चुकी थी। वर्धमान समवसरण में भगवान वर्धमान के प्रतिनिधि आचार्यश्री महाश्रमणजी जैसे ही पधारे, पूरा प्रवचन पण्डाल जयघोष गूंज उठा। वर्धमान महोत्सव के दूसरे दिन के मुख्य कार्यक्रम का शुभारम्भ युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ हुआ। तेरापंथी सभा-बोरावड़ के मंत्री श्री गजेन्द्र बोथरा व श्रीमती नताशा बेताला ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। बोरावड़ की बहन-बेटियों ने गीत का संगान किया। आचार्यश्री बोरावड़ की बहन-बेटियों को आचार्यश्री ने मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी ने वर्धमान महोत्सव के मध्य दिवस पर अपनी अभिव्यक्ति देते हुए लोगों को उत्प्रेरित किया। तदुपरान्त तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि आज वर्धमान महोत्सव का मध्य दिवस है। हम सभी ज्ञान के क्षेत्र में वर्धमान रहें, दर्शन जगत में वर्धमान रहें और चारित्र की दृष्टि से भी तब तक वर्धमान रहें, जब तक क्षीण मोह यथा ख्यात चारित्र की प्राप्ति न हो जाए। चारित्र के पांच प्रकार बताए गए हैं-सामायिक, छेदोपस्थापनीय, परिहार विशुद्धि, सूक्ष्म संपराय तथा यथा ख्यात। इन पाचों चारित्रों में सर्वक्षेष्ठ चारित्र यथाख्यात चारित्र होता है। यथाख्यात चारित्र में भी क्षीण मोह यथा ख्यात हो जाए तो बहुत ही कल्याणकारी बात हो सकती है। सामायिक चारित्र और छेदोपस्थापनीय चारित्र वर्तमान भरतक क्षेत्र में विद्यमान है। इन चारित्र की निर्मलता आज भी प्रासंगिक है। चारित्र के अंतर्गत तप को भी जोड़ा जा सकता है। संवर और तप दोनों से चारित्र की पुष्टि हो सकती है। तपस्या के द्वारा कर्म निर्जरा होती है। हमारे धर्मसंघ में कई तरह तक के जप बताए गए हैं। इसके साथ-साथ सेवा की भावना भी होती है। सेवा करने वाले सेवा भी करते हैं और कभी तपस्या में भी रमे रहते हैं। कहीं-कहीं सेवा की अपेक्षा ज्यादा हो सकती है। कई ऐसे भी हो सकते हैं जो तपस्या और सेवा में भी लग जाते हैं। कोई ऐसे भी हो सकते हैं, जो अपने दिमाग से भी सेवा प्रदान करते हैं और कई बार शारीरिक सेवा देते हैं। परस्पर सेवा व सहयोग की अपेक्षा होती है। परिचर्या के रूप में भी सेवा होती है। सेवाकेन्द्र में भी सेवा देने की बात होती है। सेवाधर्म भी बहुत आवश्यक होता है। एक बार अन्य कार्य छोड़ा जा सकता है, किन्तु सेवा में हमेशा तत्पर रहना आवश्यक होता है।
सेवा धर्म को योगियों के लिए भी अगम्य है। चारित्र की निर्मलता अच्छी रहे। पाचों महाव्रतों के प्रति जागरूकता रहे। सेवा की भावना बनी रहे। सेवा-समर्पण के भाव बने रहें। जहां आवश्यकता हो, वहां जाने और सेवा का मनोभाव बना रहे। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वीवृंद ने गीत का संगान किया।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में दिवंगत साध्वी मनुयशाजी की स्मृतिसभा का आयोजन हुआ, जिसमें आचार्यश्री ने उनका संक्षिप्त परिचय प्रदान करते हुए उनकी आत्मा के ऊर्ध्वागमन करने कामना की। आचार्यश्री ने उनकी आत्मा के कल्याण के लिए चतुर्विध धर्मसंघ के साथ चार लोगस्स का ध्यान कराया। उनके संदर्भ में मुख्यमुनिश्री, साध्वीप्रमुखाजी ने मंगलकामना की। साध्वीजी के संसारपक्षीय परिवार की ओर से सुश्री अंजलि ने अपनी अभिव्यक्ति दी। परिवार के सदस्यों ने गीत का संगान किया।
तेरापंथ युवक परिषद अध्यक्ष श्री अमित भण्डारी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। तेरापंथ कन्या मण्डल ने अपनी प्रस्तुति दी। अखिल भारतीय माहेश्वरी सेवा सदन के महामंत्री श्री रमेशचन्द्र छापरवाल ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। श्रीमती हेमा गेलड़ा आदि ग्रुप ने भी अपने गीत को प्रस्तुति दी। ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों व ज्ञानशाला की प्रशिक्षिकाओं ने अपनी प्रस्तुति दी। राजकीय पीएमश्री उच्च माध्यमिक विद्यालय के प्रिंसिपल श्री मनीष परिक ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी।


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