
सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
Key Line Times
लाडनूं, डीडवाना-कुचामन (राजस्थान), भौतिकता की अंधी दौड़ वाले इस वर्तमान युग में अध्यात्म को स्वीकार करने का ऐतिहासिक और अद्भुत दृश्य आज जैन विश्व भारती, लाडनूं में देखने को मिला। योगक्षेम वर्ष के अंतर्गत शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में भव्य जैन भागवती दीक्षा समारोह आयोजित हुआ, जिसमें तीन मुमुक्षुओं प्रिया महनोत, रक्षा ओस्तवाल और प्रिशा गादीया ने संसार से संन्यास और राग से वैराग्य के मार्ग पर कदम बढ़ाते हुए संयम जीवन अंगीकार किया। यह समारोह इसलिए भी ऐतिहासिक बन गया क्योंकि इनमें से मात्र 10 वर्षीय बालिका प्रिशा गादीया ने इतनी लघु आयु में दीक्षा ग्रहण कर सभी को अचरज में डाल दिया। आज के युग में इतनी छोटी उम्र में भौतिकता से अध्यात्म की राह में बढ़ने वाले विरले ही होते है। देश-विदेश के कोने-कोने से आए हजारों श्रद्धालु इस अभूतपूर्व प्रसंग के साक्षी बने।साध्वी वृंद द्वारा योगक्षेम गीत से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। दीक्षा संस्कार की विधि से पूर्व मुमुक्षु भावना नाहटा ने दीक्षार्थियों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया, जिसके पश्चात पारमार्थिक शिक्षण संस्था के बजरंग जैन ने परिजनों द्वारा लिखित आज्ञा-पत्र का वाचन किया। जिसे दीक्षार्थियों के माता-पिता ने गुरुदेव के श्रीचरणों में भेंट किया। तीनों दीक्षार्थियों द्वारा अपने वैराग्य भाव व्यक्त किए जाने के उपरांत, आचार्य श्री ने आगम सूक्तों का वाचन कर उन्हें संयम जीवन प्रदान किया। आचार्य श्री के निर्देशानुसार साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी ने नवदीक्षित साध्वियों का केश लुंचन किया। यह प्रक्रिया इस उक्ति का द्योतक है कि “शिष्य की चोटी गुरु के हाथ में रहती है” और यह श्रमण संस्कृति की कठोर केश लोच परंपरा का प्रतीक है। केश लोच के पश्चात नवदीक्षितों को ‘रजोहरण’ प्रदान किया गया, जो साधु चर्या का सबसे अभिन्न अंग माना जाता है। साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी ने उद्बोधन प्रदान किया। मुनि दिनेश कुमार जी ने समारोह का संयोजन किया।
आज दीक्षा के प्रसंग पर आचार्य श्री ने कहा कि पहले शिक्षा होती है, फिर परीक्षा और अंत में समीक्षा के बाद दीक्षा का क्रम आता है। दीक्षा कोई सामान्य कार्य नहीं है; इसमें जीवन भर के लिए सर्व सावद्य (पापपूर्ण) कार्यों का त्याग किया जाता है और गुरु के अनुशासन में रहना होता है। आगम के अनुसार ‘समय पर अध्ययन हो’। नवदीक्षित साध्वियों का स्वाध्याय निरंतर चलना चाहिए, क्योंकि भोजन शरीर की खुराक है, परंतु स्वाध्याय संयम की असली खुराक है। नवदीक्षितों के लिए छह महीने का प्रशिक्षण कोर्स होता है।
स्वाध्याय के साथ उच्चारण शुद्धि का भी बहुत महत्व है। जैसे ‘नमो अरहंताणं’ में अनुस्वार का शुद्ध उच्चारण होंठ खुले रखकर ही संभव है। ज्ञान के संदर्भ में केवल सूत्र पाठ ही नहीं, बल्कि अर्थ का अवबोध भी होना चाहिए ताकि आगम की बातें दिशा-निर्देशक बन सकें। इन सबके साथ मन में सेवा की भावना प्रबल रहनी चाहिए। अपनी सामर्थ्य से बीमार, वृद्ध और सेवा के अधिकारियों की यथायोग्य सेवा करें। नवदीक्षितों को संभालना, उन्हें संस्कार देना और तैयार करना एक बहुत बड़ी आध्यात्मिक सेवा है।

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