
सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
Key Line Times
लाडनूं ,गुरुवार को जैन विश्व भारती परिसर में स्थित जैन विश्व भारती मान्य विश्वविद्यालय में आयोजित द्विदिवसीय ‘राष्ट्रीय प्राकृत विद्वत् कार्यशाला’ के संभागियों को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन प्रतिबोध प्रदान करने के लिए विश्वविद्यालय परिसर में पधारे और वहां कार्यशाला स्थल पर उपस्थित संभागियों को अपनी पावन प्रेरणा से लाभान्वित किया। आचार्यश्री का जैन विश्व भारती परिसर में लम्बे काल के लिए विराजना मानों-मानों जन-जन के लिए अपनी ज्ञानात्मक चेतना का विकास का माध्यम बन रहा है।
तदुपरान्त नित्य की भांति सुधर्मा सभा में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘करें क्रोध का निवारण’ विषय पर चतुर्विध धर्मसंघ को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि साधु जीवन में अनुकूलता मिल सकती है तो प्रतिकूलता भी प्राप्त हो सकती है। मनोनूकुल स्थिति भी आए तो साधु को उसमें अनुरक्त नहीं होना चाहिए, आकृष्ट नहीं होना चाहिए और यथासंभव उससे दूर रहने का प्रयास करना चाहिए। जो साधु मनोनूकुल परिस्थितियों में मन लगा लेता है, अनुरक्त हो जाता है, उससे पाप भी हो सकता है। इसलिए साधु को राग रखने से बचने के प्रयास के साथ-साथ उससे दूर भी रहने का प्रयास करना चाहिए। प्रतिकूल परिस्थिति में द्वेष का भाव अथवा गुस्से का आ जाना भी बुरी बात होती है। साधु को तो प्रतिकूल परिस्थितियों में समभाव रखने का प्रयास करना चाहिए।
आदमी को अपने क्रोध का निवारण करने का प्रयास करना चाहिए। प्रतिकूल व्यवहार अथवा परिस्थिति में आदमी को गुस्सा आ जाता है, यह आदमी की कमजोरी होती है। इसलिए आदमी को यथासंभवतया प्रतिकूल परिस्थितियों में भी गुस्सा न आए, ऐसा प्रयास करना चाहिए। प्रतिकूल परिस्थितियों को शांति के साथ सहन करने का प्रयास करना चाहिए। साधु को महान प्रसन्नता वाला होना चाहिए। साधु को विपरीत परिस्थिति में शांत रहने का प्रयास करना चाहिए। कहा भी गया है कि जो शांत होता है, वह संत होता है। जिसका कषाय शांत नहीं है तो भला वह संत कैसे हो सकता है अथवा उसकी संतता में कमी हो सकती है।
प्रतिकूल परिस्थितियों में भी गुस्सा न आए, ऐसी साधना का विकास होना चाहिए। किसी भी प्रकार आदमी को अपने क्रोध का निवारण में करने का प्रयास करना चाहिए। क्रोध आ भी जाए तो साधु को अपनी वाणी का प्रयोग करने से बचने का प्रयास करना चाहिए। साधु ऐसा विचार करे कि अभी क्रोध आ गया मन में तो मुझे पन्द्रह मिनट नहीं बोलना है। साधु क्रोध वाले स्थान को छोड़कर कहीं भ्रमण आदि पर भी निकल सकता है, किन्तु उसे अपने क्रोध के निवारण का प्रयास करना चाहिए। प्रेक्षाध्यान के माध्यम से भी अपने क्रोध का निवारण करने का प्रयास करना चाहिए।
गृहस्थ जीवन में भी आदमी सामूहिक रूप में रहता है। वहां भी कई बार गृहस्थ को गुस्से के प्रसंग का सामना करना पड़ता है। गृहस्थ भी स्वयं को मौन रखकर, अनुप्रेक्षा आदि के माध्यम से स्वयं के क्रोध पर नियंत्रण करने का प्रयास करना चाहिए। जहां भी आदमी रहे, क्रोध से बचने और शांति से रहने का प्रयास करना चाहिए। मौके पर कहना भी चाहिए, सहन करना चाहिए और शांति से रहना चाहिए। जहां तक हो सके आदमी को अपने क्रोध का निवारण करने का प्रयास करना चाहिए। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने नित्य की भांति चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को समाहित किया।

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