
सुरेंद्र कुमार, ऐसोसिएट एडिटर
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02.06.2026, मंगलवार, लाडनूं ,जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ की राजधानी के रूप में ख्यात लाडनूं की धरा पर स्थित जैन विश्व भारती में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी तेरापंथ धर्मसंघ का दूसरा योगक्षेम वर्ष सुसम्पन्न कर रहे हैं। आचार्यश्री की उपस्थिति से पूरी लाडनूं नगरी मानों धर्म नगरी बनी हुई है। देश-विदेश से श्रद्धालु अपने आराध्य की मंगल सन्निधि में उपस्थित होकर दर्शन, सेवा व उपासना का लाभ प्राप्त कर रहे हैं। इस योगक्षेम वर्ष में अनेकानेक आध्यात्मिक गतिविधियों का संचालन हो रहा है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु इसका लाभ उठा रहे हैं। मंगलवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के दौरान सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘विगय सेवन में हो विवेक’ को विवेचित करते हुए कहा कि साधना के क्षेत्र में तपस्या का भी महत्त्व है। तपः कर्म के द्वारा कर्म निर्जरा होने का सिद्धांत है। एक दृष्टि से देखें तो तपस्या और निर्जरा अलग-अलग हैं। तपस्या कारण है और निर्जरा उसका कार्य है। कारण अलग चीज और कार्य अलग चीज है। इस प्रकार तपस्या और निर्जरा में कार्य-कारण का संबंध है, किन्तु जहां कार्य-कारण में अभेद की स्थापना कर दी जाए वहां तपस्या के बारह भेद निर्जरा के बारह भेद हो जाते हैं। साधु के जीवन में भी तप का अपना स्थान होता है। जितना संभव हो, तपस्या चलनी चाहिए। तपस्या के अनेक आयाम हैं। साधु के जीवन में तपस्या करने का प्रयास होना ही चाहिए। अनशन, ऊनोदरी, भीक्षाचरी और रस परित्याग अनाहार से जुड़े हुए तप हैं। रस परित्याग उनमें से एक है।
साधना के क्षेत्र में आहार संयम का अच्छा स्थान है। साधना करनी है तो भोजन का विवेक व संयम होना चाहिए। आहार के सेवन में भी विवेक का होना बहुत अपेक्षित होता है। सभी आदमी के जीवन में आहार के प्रति संयम सभी के जीवन में रहना चाहिए। आदमी को ऊनोदरी भी रखने का प्रयास करना चाहिए। हल्का भूख रहे अथवा खाने में अल्पता का क्रम होता है तो साधना और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी सुविधा प्राप्त हो सकती है। इसके लिए आदमी को ऊनोदरी करने का प्रयास करना चाहिए। आहार में क्या ग्रहण करना है और क्या ग्रहण नहीं करना, इसका विवेक रखने का प्रयास होना चाहिए। दूध-दही को विगय कहा गया है। इनके सेवन में भी संयम रखने का प्रयास होना चाहिए। ज्यादा खाने से एकबार शरीर में कठिनाई हो अथवा न हो, किन्तु कई बार इससे साधना में बाधा जरूर उत्पन्न हो जाती है। इसलिए आदमी को आहार, पानी, विगय आदि में संयम रखने का प्रयास होना चाहिए।
गृहस्थों को भी अपने आहार-पानी में संयम और शुद्धता रखने का प्रयास होना चाहिए। श्रावक-श्राविकाओं को नॉनवेज से दूरी बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। दूध-दही अथवा इनसे बनी हुई चीजों के सेवन से भी बचने का प्रयास करना चाहिए। यह मानों तपस्या व संयम में एक विशेष प्रयोग की बात हो सकती है। दूध और दही खाने वाले खा सकते हैं, किन्तु उनके प्रयोग में संयम रखने का प्रयास करना चाहिए। अनाहार के संदर्भ में जितना तपाराधना होता रहे, ऐसा प्रयास करना चाहिए। भोजन लेना भी होता है, किन्तु कितनी मात्रा और किस तरह लेना चाहिए, इसका विवेक होना भी आवश्यक होता है। साधना व स्वास्थ्य की दृष्टि से भी आहार संयम, विगय वर्जन आदि के संदर्भ में विवेक व संयम रखने का प्रयास करना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त मुनि जम्बूकुमारजी (सरदारशहर) ने वर्तमान आचार्यश्री के युग में हुए अनेक कीर्तिमानों का उल्लेख करते हुए अपनी अभिव्यक्ति दी।

