surendra Munot Associate Editor all india
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18.07.2026, शनिवार, लाडनूं ,जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शनिवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘जहाज में सवार: पहुंचे भवपार’ को आगमवाणी के माध्यम से विवेचित करते हुए कहा कि संसार रूपी महासमुद्र में नौका दौड़ रही है, और जीव उस नौका में आरूढ़ है, वह कैसे उस समुद्र का पार कर सकता है। बताया गया कि एक नौका आश्रव वाली होती है, उसमें छेद होता है तो उस नौका से पार करने की आशा नहीं की जा सकती। वह मध्य में ही डुबा देने वाली हो सकती है, किन्तु निराश्रव अथवा बिना छेद वाली नौका ही जीवों को पार पहुंचाने वाली बन सकती है। यह विवेक कर लेना चाहिए कि छिद्रयुक्त नौका है या निश्छिद्र नौका।
यहां शरीर को नौका के रूप में बताया गया है। जीव का औदारिक शरीर नौका है और संसार ही समुद्र है। जीव नाविक है। इस भवसागर को महर्षि लोग तर जाते हैं। इस शरीर के द्वारा साधना की जा सकती है। संयम और तप की आराधना की जा सकती है। यह साधना में साधन बनती है। यदि इस शरीर के द्वारा अशुभ योग की प्रवृत्ति होती है, चारित्र नहीं, सम्यक्त्व नहीं रहता है तो जीव के कर्म पाप कर्म का बंध कराने वाली होती है। संयमी जीवन हो तो यह शरीर रूपी नौका बिना छेद वाली नौका होती है।
आदमी को यह विचार करना चाहिए कि उसे अपने शरीर रूपी नौका को बिना छेद वाली बनाने के लिए लिए संयम और चारित्र में रत रहने का प्रयास करना होगा। इसलिए चारित्र बहुत बड़ी बात होती है। सम्यक्त्व के बिना चारित्र की क्रिया करने पर भी मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती। सम्यक्तव की प्राप्ति होने से ही नौका बिना छिद्र वाली रह सकती है।
मनुष्य जीवन में आश्रवों का निरोध करने का प्रयास हो तो निराश्रव नौका भव से पार करने वाली बन सकती है। ऐसी नौका में बैठकर भवसागर को पार किया जा सकता है। इस नौका का अच्छा उपयोग कर भवसागर से पार उतरने का प्रयास हो। दिन-प्रतिदिन समय जा रहा है, इसके लिए आदमी कितना प्रयास कर रहा है, इस विषय पर ध्यान देने का प्रयास होना चाहिए। इस नौका से भवसागर को पार करना है तो संयम व तप की साधना करने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि अब आचार्यश्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष की सम्पन्नता का समय भी निकट है। इस दिन ही बोधि दिवस भी है। इस योगक्षेम वर्ष में श्रावक-श्राविकाओं के लिए 27 जुलाई से 31 जुलाई तक पचरंगी तप करने की बात है। संत लोग व साध्वीवृंद लोगांे का नाम नोट करने में अपना पुरुषार्थ करने का प्रयास होना चाहिए। श्रावक-श्राविकाओं को एक-एक कदम आगे बढ़ाने का प्रयास होना चाहिए। चतुर्मास लगने से पहले और चतुर्मास लगने के बाद सम्पन्न होने वाला उपक्रम है। चतुर्मास लगने का समय निकट आ रहा है। चतुर्मास में तपस्या का क्रम भी चलता है। अभी तो पचरंगी की बात है। यह भी शरीर रूपी नौका को आगे बढ़ाने का प्रयास है। इससे कर्म निर्जरा होती है और भवसागर को पार कराने में सहायक बन सकती है।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान किए।

