सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
Key Line Times
लाडनूं, डीडवाना-कुचामन (राजस्थान) ,लगभग 37 वर्षों बाद जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ में योगक्षेम वर्ष का आयोजन हो रहा है। इस सुअवसर का आध्यात्मिक उठाने के लिए तेरापंथ धर्मसंघ का जन-जन उत्साहित और उल्लसित है। देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती परिसर में पहुंच रहे हैं और यथावसर इस महोत्सव का पूर्ण लाभ उठाने का प्रयास कर रहे हैं। आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में आयोजित होने वाला मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में भी चतुर्विध धर्मसंघ की विराट उपस्थिति इस बात को मानों स्वतः प्रमाणित कर रही है। बड़ी संख्या में साधु, साध्वियां, समणियां व मुमुक्षु बहन-भाइयों के साथ-साथ श्रावक-श्राविकाएं अपने आध्यात्मिक ज्ञान के संवर्धन और अपने जीवन को सुगति की ओर ले जाने के लिए आचार्यश्री की मंगल प्रेरणाओं का लाभ प्राप्त कर रहे हैं।
शनिवार को मुख्य प्रवचन कार्यक्रम भी नित्य की भांति शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ प्रारम्भ हुआ। तदुपरान्त साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत को प्रस्तुति दी। युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘कैसे सहें अनुशासन’ को आगमों के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि जहां सामुदायिक जीवन होता है, वहां व्यवस्था तंत्र की और अनुशासन की भी आवश्यकता हो सकती है। मनुष्य सामुदायिक जीवन जीता है। इस दुनिया में देखें तो चाहे देश हो, राष्ट्र, प्रान्त, नगर आदि हर जगह एक शासन प्रणाली चलती है। भले कहीं राजतांत्रिक प्रणाली हो अथवा लोकतांत्रिक प्रणाली हो, सभी जगह एक मुखिया होता है। राजतंत्र में राजा का प्राधान्य और लोकतांत्रिक प्रणाली में मंत्री, प्रधानमंत्री आदि-आदि होते हैं। जहां मनुष्य का सामुदायिक जीवन होता है, वहां एक शासन प्रणाली होती है। प्रश्न हो सकता है कि शासन प्रणाली की क्या आवश्यकता, जिसका जैसा मन हो, आदमी वैसा करे। शासन प्रणाली भी आवश्यक होती है। आदमी को भोजन, मकान, आदि-आदि अपेक्षित होती है, जिसकी प्राप्ति उसके लिए अभिष्ट होती है। एक आदमी के पास रोटी है और कोई दूसरा उससे रोटी छिन ले जाए। मकान किसी और का है और कोई दूसरा उसको जबरदस्ती वहां से भगाकर स्वयं रहने लग जाए तो ऐसे में आदमी शांति से जीवन कैसे जी सकता है? इसलिए जीवन को शांति और सुचारू ढंग से चलाए रखने के लिए शासन प्रणाली की अपेक्षा होती है। न्यायपालिका का विधान इसीलिए बनी है कि ऐसी अव्यवस्थाओं को दूर करने के लिए शासन-प्रशासन की आवश्यकता होती है। अपराध को रोकने और अपराधियों को दण्डित करने के लिए न्यायपालिका की आवश्यकता होती है। दण्ड मिलने से अपराधी भी सुधर सकता है और उसे देखकर दूसरे भी ऐसे अपराध से बचेंगे। न्यायपालिका को भी न्याय देने का प्रयास करना चाहिए।
बिना किसी गलती के किसी को सजा न मिले, ऐसा न्यायपालिका का प्रयास होना चाहिए तथा जो अपराधी है, उसे दण्ड मिले ही, इसलिए न्यायपालिका की आवश्यकता होती है। नियम-कायदा कानून के विधायिका होती है। शासन-प्रशासन में कार्यपालिका के रूप में कार्य करती है। नियमों के अनुसार सभी को अच्छे ढंग से चलने का प्रयास करना चाहिए। दो ही प्रकार की शासन प्रणालियों का मूल लक्ष्य जनता की सुख-शांति और उनके विकास की भावना ही होती है। इसके लिए शासन, अनुशासन और प्रशासन की अपेक्षा होती है। वहीं बात संगठनों में भी होती है। जहां संस्थाएं होती हैं, उनके भी अपने नियम, कानून आदि की व्यवस्था होती है। विधान, व्यवस्था बढ़िया हो और उसके अनुरूप पालन होता रहे तो कोई संगठन अच्छी तरह चल सकता है। विधान में समयानुसार परिवर्तन, संशोधन भी होता है। विधान बढ़िया हो और उसका पालन भी बढ़िया हो तो सभी तंत्र ठीक ढंग से कार्य हो सकता है।
जहां धार्मिक संगठन होते हैं, वहां भी शासन-प्रशासन की बात आती है। साधु-साध्वियों का भी समुदाय है तो वहां भी विधि-विधान की आवश्यकता होती है। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के प्रथम अनुशास्ता आचार्यश्री भिक्षु हुए। उन्होंने व्यवस्थाएं-नियम बनाईं। अनुशासन संहिता, मर्यादावली आदि विधान हैं। श्रावकों के लिए श्रावक संदेशिका उपलब्ध हैं। इस प्रकार व्यवस्थाएं स्पष्ट हैं। कभी जानकारी के अभाव में भी गलती हो सकती है। इसलिए नियमों की जानकारी रखने का प्रयास करना चाहिए। व्यवस्थाओं को सुचारू ढंग से चलायमान रखने के लिए अनुशासन को सहन करने का प्रयास करना चाहिए। कहा कि गया है कि सहन करो, सफल बनो।
आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं को प्रेरणा प्रदान की तथा चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को भी समाहित किया। जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के अंतर्गत संचालित उपासक सेमिनार के संदर्भ में उपासक श्रेणी के संयोजक श्री सूर्यप्रकाश श्यामसुखा व श्री जयंतीलाल सुराणा ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। उपासक श्रेणी ने समूह रूप में गीत को प्रस्तुति दी। परम पूज्य आचार्यश्री महाश्रमणजी ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।

गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत की प्रेरणा से प्राकृतिक खेती की राह पर चले डांग के किसान उमेशभाई राउत 