सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
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26.05.2026, मंगलवार, लाडनूं ,जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ की राजधानी में लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती में योगक्षेम वर्ष का मंगल प्रवास कर रहे हैं। आचार्यश्री की वाणी से निरंतर प्रवाहित होने वाली ज्ञानगंगा में चतुर्विध धर्मसंघ गोते लगा रहा है। प्रतिदिन सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को नित्य प्रति आध्यात्मिक ज्ञान की खुराक प्राप्त होती है।
मंगलवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘पाप श्रमण कौन? पर पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि श्रमण धर्म को स्वीकार कर लेना बहुत बड़ी बात है। श्रमण धर्म की आराधना से सुगति की प्राप्ति होती है। इहलोक और परलोक का हित भी होता है। शास्त्र में बताया गया कि श्रमण धर्म की प्राप्ति के लिए बहुश्रुत की पर्युपासना करनी चाहिए और उससे प्रतिप्रश्न भी करना चाहिए। उपासना में सुनने और जानने का अवसर मिलता है। केवल पर्युपासना से भी हित हो सकता है। उपासना अथवा पर्युपासना में बैठने से आदमी प्रमाद से बचता है तो किसी न किसी अंश में उसका कल्याण तो हो ही जाता है। बड़ों के पास बैठने से उनकी बात, व्यवहार को देखकर और उनकी बातों को सुनकर भी कुछ सीखा जा सकता है और यदि सीधा संवाद हो जाए तो और अच्छी बात हो सकती है कि कोई जिज्ञासा हो तो पूछ लिया और उसका समाधान मिल जाए तो कितनी अच्छी बात हो सकती है।
इसलिए बहुश्रुत की पर्युपासना से श्रमण धर्म के बारे मंे जानकारी भी मिलती है। श्रमण धर्म की जानकारी होने के बाद व्यक्ति के मन में वैराग्य का भाव जागृत हो जाए और वह साधु बन जाए तो कितनी अच्छी बात हो सकती है। सघन साधना शिविर अभी लगा हुआ है। यह शिविर बहुत अच्छा लग रहा है। इसमें कितने बालक-बालिकाएं संभागी बने हुए हैं। बहुत अच्छा उपक्रम है। कुछ वर्षों से यह उपक्रम चल रहा है। यह सघन साधना शिविर है। इनको प्रशिक्षण देने वालों के द्वारा इनके भीतर साधना के संस्कार उद्भुत हो जाएं तो कितनी अच्छी बात हो सकती है। इनमें से कोई मुमुक्षु बन जाए तो कितनी निष्पत्तिपूर्ण बात हो सकती है। जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के तत्त्वावधान में शिविर लगते हैं। योगक्षेम वर्ष में अनेक शिविर लगाया जा सकता है।
श्रमण धर्म में कुछ कठिनाईयों को सहना, रात्रि भोजन का परिहार आदि के कष्ट को सहना होता है। धार्मिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए सघन साधना शिविर वांछनीय है। श्रमण धर्म को स्वीकार करने के बाद भी श्रमण-श्रमण में अंतर होता है। इनमें कई पाप श्रमण भी हो सकते हैं। श्रमण धर्म को स्वीकार करने के बाद भी जिसमें साधना के क्षेत्र में अच्छा पुरुषार्थ नहीं है तो कमी की बात हो सकती है। आहार-पानी कर सो जाना, स्वाध्याय आदि नहीं करना आदि वृत्तियां अच्छी नहीं होती। श्रमण को पुरुषार्थ करने का प्रयास करना चाहिए। स्वाध्याय, सामायिक, जप आदि का प्रयोग करने का प्रयास करना चाहिए। जितना संभव हो सके साधना, जप, ध्यान आदि का प्रयोग भी करने का प्रयास होना चाहिए। बार-बार नींद लेने वाला, आचार्य-उपाध्यायों से ज्ञान लेने के बाद भी उनकी निंदा करने वाला, उनकी सम्यक् चिंता भी नहीं करने वाला, चर्या के प्रति अजागरूक साधु पाप श्रमण कहलाता है। इसके लिए साधु को पूर्ण जागरूकता के साथ अपने साधुत्व का पालन करने का प्रयास करना चाहिए। यह चिंतन किया जा सकता है कि जो-जो पाप श्रमण के लक्षण बताए गए हैं, अगर वैसे लक्षण हों तो उसे दूर करने और सम्यक् पराक्रम, पुरुषार्थ करने का प्रयास करना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं को अपनी जिज्ञासाओं को प्रकट करने का अवसर प्रदान किया तो आचार्यश्री ने उनकी जिज्ञासाओं को भी उत्तरित किया।

