
रामदेव सजनाणी,राष्ट्रीय संवाददाता
Key Line Times
जोधपुर, यह कैसा सख्त कानून है सरकार का जिसे सरकार के नुमाइंदे ही जेब में रखकर घूमते हैं? दुनिया का सबसे ताकतवर सूचना का अधिकार कानून 2005 आज अफसरों की मर्जी का गुलाम बन गया है। कानून कहता है 30 दिन में पूरी सूचना दो, मगर तहसीलदार और नगरपालिका इसे रद्दी का टुकड़ा समझते हैं। आधा अधूरा जवाब देकर, ‘प्रश्नात्मक’ का बहाना बनाकर जनता की आंख में धूल झोंकी जा रही है।
पश्चिमी राजस्थान में RTI का खुलेआम मखौल उड़ाया जा रहा है। बापिणी और देचू सेतरावा तहसीलदार ने 20 में से सिर्फ 2 बिंदुओं का जवाब देकर 18 सवाल दबा दिए। वहीं लोहावट तहसीलदार, बाप तहसीलदार और बाप नगरपालिका ने तो प्रथम अपील के बाद भी जवाब देना जरूरी नहीं समझा।
*क्या मांगा था RTI में?*
सजनाणियों की ढाणी निवासी रामदेव सारण ने 21 अप्रैल 2026 को बापिणी, देचू सेतरावा, लोहावट, बाप सहित कई तहसीलों से एक जैसी RTI लगाई थी। 31 मार्च 2021 से 31 मार्च 2026 तक आगजनी की घटनाओं पर 20 बिंदुओं में पूछा था: कितनी आग लगी, कितने मरे, दमकल है या नहीं, मुआवजा कितना मिला।
*बापिणी और देचू सेतरावा का एक जैसा खेल*
बापिणी एसडीएम तहसीलदार ने 18 बिंदुओं को यह कहकर लौटा दिया कि “हम प्रश्नों के उत्तर नहीं देते। धारा 2(च) में प्रश्नात्मक जानकारी नहीं आती।” ठीक इसी तर्ज पर देचू एसडीएम देचू,सेतरावा तहसीलदार ने भी 18 बिंदु दबा दिए और सिर्फ 2 का जवाब थमा दिया।
अब सबसे बड़ा सवाल: अगर 18 बिंदु ‘प्रश्नात्मक’ थे तो 2 का जवाब किस कानून से दे दिया? ‘दमकल है या नहीं’ और ‘कितना मुआवजा दिया’ क्या ये सवाल नहीं हैं? अगर ये सूचना है तो बाकी 18 भी सरकारी रिकॉर्ड के आंकड़े ही हैं। तहसीलदारों ने खुद अपने दोहरे रवैये से कानून की धज्जियां उड़ाने का सबूत दे दिया।
*खुलासा: 5 साल में दमकल शून्य, मुआवजा 10 हजार*
बापिणी के जवाब से सामने आया कि पूरी तहसील में एक भी दमकल नहीं है। 5 साल में 28 परिवारों के घर जले। मुआवजा मिला कुल 3.03 लाख, यानी एक परिवार को औसत 10,800 रुपए। घर, अनाज, कपड़े सब राख होने पर 10 हजार की भीख। यह राहत है या सरकारी तमाचा?
*एक तरफ जवाब, दूसरी तरफ चुप्पी*
कमाल देखिए, इन्हीं 20 बिंदुओं का पूरा जवाब आऊ तहसील, घंटियाली तहसील, फलोदी तहसील और फलोदी नगरपरिषद ने दे दिया। उनके लिए कोई बिंदु ‘प्रश्नात्मक’ नहीं बना। मगर बापिणी और देचू सेतरावा को अचानक नया कानून याद आ गया।
इससे भी शर्मनाक बात यह है कि लोहावट तहसीलदार, बाप तहसीलदार और बाप नगरपालिका ने प्रथम अपील लगने के बाद भी RTI का जवाब तक नहीं दिया। यानी अपील का भी कोई डर नहीं।
*वकील बोले: यह लोकतंत्र की हत्या है*
जोधपुर हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता कहते हैं, “यह RTI की मूल आत्मा पर हमला है। धारा 2(च) में ‘रिकॉर्ड’ को सूचना माना गया है। कितनी घटना हुई, कितना नुकसान हुआ, ये सब रजिस्टर में दर्ज है। 2 बिंदुओं का जवाब देकर अफसर ने खुद मान लिया कि ये सूचना है। फिर 18 को नकारना सरासर गैरकानूनी है। यह चयनात्मक भेदभाव और भ्रष्टाचार छुपाने का तरीका है।”
*यह कैसा सख्त कानून?*
सवाल उठता है कि जब सरकार का नुमाइंदा ही कानून नहीं मानेगा तो आम जनता क्या करेगी? 30 दिन में सूचना देना अनिवार्य है, मगर यहां महीने बीत जाते हैं। प्रथम अपील का भी जवाब नहीं आता। जुर्माना का प्रावधान है, मगर लगता किसको है? जब तक अफसर पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, RTI कागजी शेर ही बना रहेगा।
*अब आर पार की लड़ाई*
रामदेव सारण ने कहा, “यह चौथे स्तंभ को दबाने की साजिश है। ‘प्रश्नात्मक’ बोलकर नाकामी और घोटाले दबाए जा रहे हैं। सभी मामलों में प्रथम अपील लगा दी है। राज्य सूचना आयोग से लेकर हाईकोर्ट तक जाएंगे। एक भी अफसर को बख्शा नहीं जाएगा। जनता को उसका हक दिलाकर रहेंगे।”
: अफसरों से 3 सीधे सवाल*
1. जब 18 बिंदु गलत थे तो 2 का जवाब किस नियम से दिया?
2. आऊ, फलोदी जवाब दे सकते हैं तो बापिणी, सेतरावा,देचू में कानून अलग कैसे?
3. लोहावट, बाप ने प्रथम अपील के बाद भी जवाब क्यों नहीं दिया?

