
सुरेंंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
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कंटालिया, पाली (राजस्थान) ,आचार्यश्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष ‘भिक्षु चेतना वर्ष’ का महाचरण तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य आचार्यश्री भिक्षु की जन्मस्थली कंटालिया में भव्य एवं आध्यात्मिक वातावरण में गतिमान है। कंटालिया में तेरह रात्रियों का प्रवास अब धीरे-धीरे सुसम्पन्नता की ओर है।
गुरुवार को कंटालिया प्रवास का ग्यारहवां दिन था। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता की मंगल सन्निधि में ‘भिक्षु चेतना वर्ष’ के महाचरण का ग्यारहवें दिन का शुभारम्भ मंगल महामंत्रोच्चार से हुआ। समणीवृंद ने गीत को प्रस्तुति दी। आज के निर्धारित विषय ‘आचार्य भिक्षु की शरीर संपदा’ पर साध्वी सुमतिप्रभाजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी।
युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि धर्म एक महान तत्त्व है। उसकी साधना और आराधना में शरीर का भी योग अपेक्षित हो सकता है। एक सूक्त में कहा गया है कि शरीर धर्म की साधना और आराधना में सहायक बनता है। धर्म की साधना में स्थूल शरीर का भी सहयोग होता है। शरीर अनुकूल है तो कई घंटों तक स्वाध्याय किया जा सकता है। शरीर सक्षम है तो कई बार खड़े-खड़े भी स्वाध्याय किया जा सकता है, ध्यान किया जा सकता है। शरीर अनुकूल न हो तो घंटों-घंटों बैठना अथवा खड़ा होना संभव नहीं हो सकता। शरीर अनुकूल है तो लम्बे विहार भी हो सकते हैं और शरीर की अवस्था अनुकूल न हो तो लम्बा विहार भी करना कितना मुश्किल हो सकता है।
आचार्यश्री तुलसी ने कोलकाता से राजस्थान के राजनगर में पहुंच गए। माना जाए कि उनका शरीर अनुकूल था तो उन्होंने इतनी लम्बी यात्रा कर ली। सेवा करनी है तो भी शरीर की अनुकूलता आवश्यक होती है। गोचरी करना, व्याख्यान देना, लोगों को सेवा देना, ये सारे कार्य शरीर की अनुकूलता पर निर्भर होती है।
आज का विषय है ‘आचार्यश्री भिक्षु की शरीर संपदा।’ शरीर संपदा होना बहुत आवश्यक होता है। इस शरीर से अच्छे भी कार्य हो सकते हैं और बुरे कार्य भी हो सकते हैं। शरीर के द्वारा आध्यात्मिक, धार्मिक व सेवा परायण कार्य शरीर संपदा का अच्छा उपयोग हो सकता है। शरीर निरामय रहे, यह बहुत अच्छी बात होती है। शरीर की बलवत्ता भी होनी चाहिए। इन्द्रियों की सक्षमता भी बहुत आवश्यक होती है। शरीर की सुन्दरता भी आवश्यक होती है। हालांकि शरीर की सुन्दरता का महत्त्व बहुत थोड़ा हो सकता है। शरीर का ज्यादा महत्त्व उसकी शक्ति, उसकी इन्द्रिय सक्षमता पर निर्भर होती है। शरीर के सभी अंग पुष्ट हों, इन्द्रियों की सक्षमता रहे तो शरीर की निरामयता अच्छी हो सकती है। ऐसे शरीर से आदमी कोई भी धार्मिक-आध्यात्मिक कार्य सफलतापूर्वक कर सकता है।
आचार्यश्री भिक्षु का शरीर भी सुन्दर, निरामयता, इन्द्रिय सक्षमता, दृष्टि भी अच्छी रही। उनके शरीर में शक्ति भी रही तथा उनका शरीर निरामय भी रहा। शरीर को अनुकूल बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। खानपान, ध्यान, प्राणायाम, व्यायाम आदि का ध्यान देने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री भिक्षु ने अपने शरीर संपदा का कितना उपयोग किया होगा। गृहस्थावस्था में भी उनके कदम इस कंटालिया में कहां-कहां टिके होंगे। आज उनके जन्मस्थली में उनके शरीर की सक्षमता की बात हो रही है। स्वामीजी की स्मरण हम कर रहे हैं। इतने ज्ञानी और शरीर से सक्षम, हमारे धर्मसंघ के जनक आचार्यश्री भिक्षु स्वामी को श्रद्धा से नमन करते हैं।
आचार्यश्री की अनुज्ञा से साध्वी सिद्धांतश्रीजी, साध्वी दर्शितप्रभाजी, समणी कुसुमप्रज्ञाजी आदि समणियों व साध्वियों ने संतवृंद को वंदन कर खमतखामणा की। संतों की ओर से मुनि राजकुमारजी ने आने वाली साध्वियों से खमतखामणा की। साध्वी सिद्धांतश्रीजी आदि साध्वियों ने अपने हर्षित भावों की अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने साध्वियों को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। सुश्री सिद्धि मरलेचा ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। अहमदाबाद तेरापंथ किशोर मण्डल ने आचार्यश्री भिक्षु पर आधारित अपनी प्रस्तुति दी। आचार्यश्री ने किशोरों को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। श्रीमती प्रीति डागा ने गीत का संगान किया। श्रीमती प्रेरणा गादिया ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। श्री प्रमोद भंसाली ने अपनी प्रस्तुति दी। तुलसी ज्ञानशाला-पाली, आसिन्द ज्ञानशाला ने अपनी-अपनी प्रस्तुति दी। पाली के एमएलए श्री भीमराज भाटी ने आचार्यश्री के दर्शन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। तेरापंथ महिला मण्डल-कंटालिया ने पूज्यचरणों में तेरह संकल्पों को उपहार अर्पित किया। आचार्यश्री ने उन्हें निरवद्य संकल्पों का त्याग कराया।

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