🌸 *जीवन के प्रत्येक क्रिया के साथ जुड़े ध्यान : सिद्ध साधक आचार्यश्री महाश्रमण

सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
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कापरा, बनासकांठा (गुजरात) ,गुजरात की धरा पर गतिमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी शनिवार को अपनी धवल सेना के साथ बनासकांठा जिले में स्थित कापरा में पधारे तो कापरावासियों ने मानवता के मसीहा का भावभीना स्वागत किया। शनिवार को प्रातःकाल की मंगल बेला में शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने लाखणी से मंगल प्रस्थान किया। मार्ग में अनेक दर्शन करने वाले लोगों को मंगल आशीष प्रदान करते हुए आचार्यश्री आगे बढ़ते जा रहे थे। गर्मी के मौसम में लोग दिन के समय अपने वाहनों से भी निकलने में संकोच कर रहे हैं, ऐसे में समता के साधक आचार्यश्री महाश्रमणजी निरंतर पदयात्रा करते हुए गतिमान हैं। लगभग 14 किलोमीटर का प्रलम्ब विहार कर युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी कापरा गांव में स्थित श्री मोंघी अमृत सुन्दर तीर्थ परिसर में पधारे। जहां संबंधित लोगों ने आचार्यश्री का भावभीना अभिनंदन किया।तीर्थ परिसर क्षेत्र में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के साथ आज चतुर्दशी तिथि के संदर्भ में हाजरी का क्रम भी था तो गुरुकुलवासी चारित्रात्माओं की विशेष उपस्थिति थी। महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित जनता व चारित्रात्माओं को पावन संबोध प्रदान करते हुए कहा कि मानव जीवन में योग साधना का बहुत महत्त्व है। ध्यान भी योग साधना का एक अंग है। पंतजलि के अष्टांग योग में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि के रूप में वर्णित हैं। इन आठ अंगों में काफी व्यापकता का दर्शन किया जा सकता है, जिसमें सबकुछ विस्तारित रूप में बताया गया है। इस अष्टांग योग में अणुव्रत की बात भी समाहित और नियम की बातें, आसन और प्राणायाम की बातें आदि की सभी बातें समायोजित हैं। तेरापंथ धर्मसंघ में प्रेक्षाध्यान की बात चलती है। वर्तमान में प्रेक्षाध्यान कल्याण वर्ष भी चल रहा है। अनेक ध्यान पद्धतियां हो सकती हैं। अलग-अलग तरीकों से ध्यान कराया जा सकता है। परम पूज्य आचार्यश्री महाप्रज्ञजीप्रवर के सान्निध्य में उसके पठन का अवसर मिला था।कोई भी प्रयोग करना है तो लम्बे समय तक निरंतर करने का प्रयास होना चाहिए। जैन धर्म में मोक्ष का जो उपाय है, वह योग है। सारी धर्म की प्रवृत्ति जो मोक्ष से जोड़ती है, वह योग होता है। साधु तो योगी होते ही हैं। प्राणायाम, ध्यान का जितना उपयोग-प्रयोग हो सके, करने का प्रयास करना चाहिए। विहार के दौरान यदि चित्त केवल चलने में केन्द्रित हो जाए तो चलना भी एक साधना हो सकती है। ईर्या समिति भी योग साधना का ही एक अंग है। चलने में एकाग्रता हो जाए तो कितने ही पापों से बचाव हो सकता है। चलते समय बातों में लग जाना गमन योग में बाधा की बात हो सकती है। चलने में ईर्या समिति का ध्यान और ट्रैफिक नियमों का भी ध्यान रखने का प्रयास करना चाहिए।वर्तमान में प्रेक्षाध्यान कल्याण वर्ष चल रहा है। ध्यान की साधना का अपना महत्त्व है। ध्यान तो आदमी के पल-पल के क्रिया जुड़ जाए तो कितनी अच्छी बात हो सकती है। ध्यान से पढ़ो, ध्यान से बोलो, ध्यान से सुनो आदि न जाने कितने रूपों में ध्यान जीवन से जुड़ा हुआ है। आदमी जो भी कार्य करे, उस पर ध्यान रखने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने उत्तरज्झयणाणि को पूरा याद रखने वाले साधु-साध्वियों से सुनने को इच्छा जताई तो कुछ साध्वियों ने आचार्यश्री द्वारा पूछे गए श्लोकों को सुनाने का प्रयास किया।मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में शासनश्री साध्वी मदनश्रीजी (बीदासर) की स्मृति सभा का आयोजन हुआ। आचार्यश्री ने उनका संक्षिप्त जीवन परिचय प्रदान करने के उपरान्त मध्यस्थ भावना के साथ चतुर्विध धर्मसंघ को चार लोगस्स का ध्यान कराया। इसके उपरान्त मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी, साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने भी साध्वीश्रीजी की आत्मा के प्रति मंगलकामना की।आचार्यश्री ने हाजरी के क्रम को संपादित किया। आचार्यश्री की अनुज्ञा से साध्वी दर्शितप्रभाजी व साध्वी देवार्यप्रभाजी ने लेखपत्र का उच्चारण किया। आचार्यश्री ने साध्वीद्वय को सात-सात कल्याणक बक्सीस किए। तदुपरान्त उपस्थित चारित्रात्माओं ने अपने स्थान पर खड़े होकर लेखपत्र उच्चरित किया। आचार्यश्री के स्वागत में तीर्थ से संबंधित श्री दीपकभाई दोसी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी।

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