सुरेंंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
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परबतसर, डीडवाना-कुचामण (राजस्थान) ,जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी सोमवार को प्रातःकाल अजमेर जिले के रूपनगढ़ गांव से अगले गंतव्य की ओर गतिमान हुए। सर्दी के मौसम में भी श्रद्धालुओं को दोनों करकमलों से आशीष प्रदान करते हुए युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी निरंतर गतिमान हैं। आज विहार के दौरान महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अजमेर जिले से डीडवाना-कुचामण जिले में मंगल प्रवेश किया। डीडवाना-कुचामण जिले के अस्तित्व में आने के बाद पहली बार इस जिले की सीमा में पधारे आचार्यश्री का इस जिले से संदर्भित श्रद्धालुओं ने भावभीना स्वागत किया। ज्ञातव्य है कि अब इसी जिले के अंतर्गत स्थित बोरावड़ में आचार्यश्री वर्धमान महोत्सव करेंगे। तदुपरान्त आचार्यश्री की पावन सन्निधि में छोटू खाटू में वर्ष 2026 का मर्यादा महोत्सव समायोजित होगा। इसके उपरान्त आचार्यश्री योगक्षेम वर्ष के लिए लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती में पधारेंगे। ये तीनों स्थान वर्तमान में डीडवाना-कुचामण जिले में ही स्थित हैं तो ऐसा भी कहा जा सकता है अब आचार्यश्री का लगभग चौदह महीनों का प्रवास इसी जिले की सीमा में होगा।
महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी लगभग 11 किलोमीटर का विहार कर परबतसर गांव में स्थित सीमा मेमोरियल शिक्षण संस्थान में पधारे। आचार्यश्री ने शिक्षण संस्थान परिसर में ही आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित श्रद्धालु जनता को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि दुनिया में दो तत्त्व हैं-चेतन और अचेतन। मनुष्य के जीवन में भी दो तत्त्व आत्मा और शरीर है। आत्मा चेतनामय, ज्ञान सम्पन्न और शरीर अचेतन है। आत्मा शाश्वत है और शरीर अशाश्वत है। आत्मा का पुनर्जन्म भी होता है। जब तक आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती, तब-तक वह जन्म-मरण की प्रक्रिया में बनी रहती है।
वर्तमान में मनुष्य रूप में जो आत्माएं हैं, उनके भी जन्म-मरण का क्रम चल रहा है। आदमी अकेले ही कर्म करता है और अकेले ही अपने कृत कर्मों का फल भी भोगता है। पापकर्मों के कारण दुःख की प्राप्ति होती है और पुण्य कार्यों से सुख की प्राप्ति होती है। भौतिक सुखों की प्राप्ति भी पुण्य कर्मों से ही होती है। इस दुनिया में कोई किसी के कष्ट में बांट नहीं होता। जिस आत्मा ने जो भी कर्म किए हैं, उसका फल उस आदमी को ही भोगना होता है। कर्म कर्ता का ही अनुगमन करता है। आदमी अकेले ही जन्म लेता है, अकेले ही मृत्यु को प्राप्त होता है, अकेले ही कर्म करता है और अकेले ही उन कर्मों के फलों को भोगता है। इसलिए आदमी को यह विचार करना चाहिए कि वह ऐसा कर्म ही क्यों करे, जिसके माध्यम से उसे दुःख अथवा कष्ट की प्राप्ति हो। जीवन में जहां तक संभव हो सके, आदमी को पाप कर्मों से बचने का प्रयास करना चाहिए। किसी भी प्राणी को जानबूझ कर कष्ट देने से बचने का प्रयास होना चाहिए। जानबूझकर किसी प्राणी की हत्या आदि से भी बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपने जीवन में अहिंसा रूपी धर्म का पालन करने का प्रयास करना चाहिए। जहां तक संभव हो सके, झूठ और चोरी से भी बचने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार आदमी के जीवन में जितना हो सके, पापों से बचने और धर्म के पथ पर चलने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त स्थानीय विधायक श्री रामनिवास गावड़िया ने आचार्यश्री का हार्दिक स्वागत करते हुए अपने भावनाओं की अभिव्यक्ति दी। सीमा मेमोरियल शिक्षण संस्थान के चेयरमैन डॉ. भजनलाल, सीमा शास्त्री कॉलेज की ओर से श्री देवाराम, सिंघवी परिवार की ओर से श्री भूपेन्द्र सिंघवी, श्री सुभाष पारख व नगरपालिका चेयरमेन श्री ओमप्रकाश ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। तेरापंथ महिला मण्डल-बोरावड़ ने स्वागत गीत का संगान किया।


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