
सुरेन्द्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
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लाडनूं, डीडवाना-कुचामन (राजस्थान),योगक्षेम वर्ष की कालावधि। राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले में स्थित लाडनूं के जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमणजी का मंगल प्रवास। सुधर्मा सभा का विशाल सभागार। श्रद्धा व भक्ति के साथ उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ। गुरुवार को ऐसे भक्तिमय वातावरण में प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम का शुभारम्भ युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ हुआ। तदुपरान्त साध्वीवृंद ने गीत का संगान किया।
महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि जैन श्वेताम्बर आम्नाय में आगम वाङ्मय है। हमारे तेरापंथ धर्मसंघ में बत्तीस आगम मान्य हैं। ये सभी आगम प्रमाण के रूप में सम्मत हैं। इनमें एक आगम है उत्तरज्झयणाणि। इसके माध्यम से अनेक ज्ञान प्राप्त हैं। अध्यात्म की दृष्टि से इस आगम के माध्यम में परिषहों को सहन करने का सुन्दर मार्गदर्शन प्रदान किया गया है। इस आगम के दूसरे अध्ययन में यह ज्ञान प्राप्त होता है। कई चारित्रात्माएं इस आगम को कंठस्थ करने का भी प्रयास करते हैं।
जैन शासन में ज्ञान का बहुत महत्त्व है। ज्ञान अध्यात्म विद्या का होता है तो ज्ञान लौकिक विद्या का भी होता है। जो चारित्रात्माएं होती हैं, उन्हें किस प्रकार के ज्ञान को अधिक ग्रहण करने का प्रयास होना चाहिए, यह विवेच्य विषय हो सकता है। एक ज्ञान वह होता है, जिसके अध्ययन से आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त हो सकता है, सुन्दर आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त हो सकती है। दूसरे ऐसे भी ग्रन्थ हैं, जिनका सीधा अध्यात्म से वास्ता नहीं होता, अपितु जिनको ज्यादा पढ़ने से मन में अपवित्रता भी आ सकती है। ज्ञान ज्ञान में अंतर होता है।
जानने के लिए तो आदमी पुण्य को भी जान लेता है और पाप को भी जान लेता है, किन्तु जो ग्रहण करने योग्य हो, जिससे आत्मा का कल्याण हो उसी ज्ञान को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए। ज्ञान होने के बाद किस चीज को छोड़ना और किसे अपने जीवन का अंग बनाना, यह विवेक का विषय होता है। जिस ज्ञान से अध्यात्म की दिशा तय हो, जिससे मन में वैराग्य के भाव उत्पन्न हो जाएं, वैसेे ज्ञान को ग्रहण करने का प्रयास होना चाहिए। वह ज्ञान हितावह भी हो सकता है। जिन शासन में वह ज्ञान है, आध्यात्मिक ज्ञान है, जिससे राग से विराग की ओर गति हो जाए। आदमी राग चेतना से वैराग्य चेतना की ओर बढ़ जाए, भोग से योग की ओर गति हो जाए, मनोरंजन से आत्मरंजन की ओर प्रगति हो जाए, वैसे ज्ञान को ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए।
साधुओं को अपने सुबह का समय आध्यात्मिक ज्ञान को ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए। ज्ञान प्राप्त करने के बाद आदमी को विनीत और अविनीत की पहचान भी अच्छे ढंग से हो जाता है। जो साधु आज्ञा, निर्देश का पालन करने वाले, आगम व गुरु की आज्ञा निर्देश का पालन करने वाले विनीत होते हैं। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने आज भी जिज्ञासा-समाधान का अवसर प्रदान किया।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में आज शासनश्री साध्वी सरोजकुमारीजी (मुम्बई) की स्मृतिसभा का आयोजन हुआ, जिसमें आचार्यश्री ने उनके जीवन का संक्षिप्त परिचय प्रदान करते हुए उनकी आत्मा के प्रति आध्यात्मिक मंगलकामना की। आचार्यश्री के साथ चतुर्विध धर्मसंघ ने उनकी आत्मा की आध्यात्मिक उन्नति के लिए चार लोगस्स का ध्यान किया। इसके उपरान्त मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी, साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी, साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने उनकी आत्मा के प्रति आध्यात्मिक मंगलकामना की। उनकी सहवर्ती साध्वी चिरागप्रभाजी, गुजरात की साध्वियां व समणीवृंद ने समूह रूप में गीत को प्रस्तुति दी। शासन गौरव साध्वी कनकश्रीजी, साध्वी लब्धिश्रीजी, साध्वी रचनाश्रीजी व समणी कुसुमप्रज्ञाजी ने उनके प्रति अपनी भावांजलि दी। साध्वी सरोजकुमारीजी की सहवर्तिनी साध्वीवृंद ने गीत का संगान किया। मुनि कमलकुमारजी ने भी अपनी भावांजलि दी। उनके संसारपक्षीय परिवार की ओर से श्रीमती भारती झवेरी, योगक्षेम वर्ष प्रवास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष श्री प्रमोद बैद, तेरापंथ महिला मण्डल-लाडनूं की अध्यक्ष श्रीमती शोभाजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।

