surendra Munot Associate Editor all india
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लाडनूं, जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन चातुर्मास से जैन विश्व भारती परिसर मानों महाविदेह क्षेत्र सी पावन आभा बिखेर रहा है। योगक्षेम वर्ष के दौरान रम्य सुरम्य परिसर में सैकड़ों साधु साध्वियों की पवित्र उपस्थिति इस धरा को और पावनता प्रदान कर रही है। अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह के समायोजन पश्चात आचार्य प्रवर के सान्निध्य में आज “योग प्रत्याख्यान से क्या मिलेगा ?” विषय पर मुख्य प्रवचन कार्यक्रम रहा।
सायंकाल शिव विधानसभा क्षेत्र के विधायक श्री रविंद्रसिंह भाटी अपने क्षेत्रीय दौरे के दौरान जैन विश्व भारती में आचार्यश्री के दर्शनार्थ पहुंचे एवं आशीर्वाद प्राप्त किया। इस दौरान उन्होंने आचार्य प्रवर से चर्चा-वार्ता कर मार्गदर्शन प्राप्त किया।
मंगल उद्बोधन में आचार्य श्री ने कहा – योग शब्द अनेकार्थक है। जहाँ एक ओर साधना के संदर्भ में योग शब्द व्यवहृत होता है ‘मोक्षोपायो योगो’ अर्थात् ज्ञान, दर्शन और चारित्र की साधना योग है। परंतु जैन दर्शन में शरीर, वाणी और मन की प्रवृत्ति को योग कहा गया है। यहाँ धर्म से कोई संबंध नहीं है। चाहे नास्तिक करे, आस्तिक करे या अन्य जीव करे वह सबका योग है। तत्त्व की भाषा में स्थावर जीवों में केवल काययोग होता है, वचन और मनोयोग नहीं। द्वींद्रिय, त्रींद्रिय और चतुरिंद्रिय जीवों में काययोग और वचनयोग दोनों होते हैं। देवों, नारकियों, मनुष्यों और संज्ञी पंचेंद्रिय जीवों में मन, वचन और काय ये तीनों योग होते हैं। संज्ञी प्राणी जितना पाप या धर्म करके ऊपर जा सकते हैं, उतना स्थावर या विकलेंद्रिय जीव नहीं कर सकते।
- आचार्यश्री ने आगे तात्विक व्याख्या करते हुए कहा कि योग प्रत्याख्यान का अर्थ योग-निरोध हो जाना है, जिससे जीव अयोगी अवस्था को प्राप्त करता है। 14वें गुणस्थान में पहुँचने पर साता वेदनीय का भी बंध नहीं होता और समस्त कर्म-बंध रुक जाते हैं। जब तक योग रहता है तब तक बंध होता है, योग समाप्त होने पर बंध नहीं होता। यह शैलेषी अवस्था मेरु पर्वत की तरह सर्वथा अप्रकंप और स्थिर होती है, जहाँ मन, वचन और काया की कोई चंचलता नहीं रहती। 14वें गुणस्थान की इस शुक्ल ध्यान की पराकाष्ठा में पूर्ण स्थिरता होती है। योग प्रत्याख्यान से जीव अयोगत्व को प्राप्त करता है, जिससे नए कर्मों का बंध नहीं होता और पूर्वबद्ध कर्मों की निर्जरा होकर जीव अल्प समय में ही सिद्धत्व को प्राप्त हो जाता है। साधक आंशिक रूप में योग प्रत्याख्यान का अभ्यास बार-बार कर सकते हैं। काय-स्थिरता और ध्यान के प्रयोग वस्तुतः आंशिक अयोग साधना और सावद्य योगों की निवृत्ति हैं। प्रसंगवश आचार्यप्रवर ने फरमाया कि अर्हत् वंदना के समय वंदनासन में बैठकर मेरुदंड और गर्दन को सीधा रखकर, हाथों को स्थिर जोड़कर पाठ करना और मन-वाणी को एकाग्र रखना एक सुंदर प्रयोग है। इस प्रकार अर्हत् वंदना को ध्यान और स्वाध्याय के रूप में साधकर इस अवसर को व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए।

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