surendra Munot Associate Editor all india
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*-चारित्र सम्पन्नता से क्या मिलेगा? विषय पर आचार्यश्री द्वारा तात्विक विश्लेषण*
*04.11.2026, बुधवार, लाडनूं :*
तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में चतुर्विध धर्म संघ योगक्षेम वर्ष की आराधना में संलग्न है। जैन विश्व भारती का सुरम्य परिसर भी साधु साध्वियों की विराट उपस्थिति में अनूठी आध्यात्मिक आभा बिखेर रहा है। आचार्य प्रवर द्वारा योगक्षेम व्याख्यानमाला के अंतर्गत नित नवीन आर्हत वाणी के रहस्यों की सुगम व्याख्या से जनमानस लाभान्वित हो रहा है। इसी क्रम में आज “चारित्र सम्पन्नता से क्या मिलेगा ?” विषय पर आचार्यप्रवर ने तात्विक विश्लेषण प्रदान किया।
सुधर्मा सभा में उद्बोधन प्रदान करते हुए शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने कहा – सम्यक चारित्र की साधना के लिए सम्यक ज्ञान और सम्यक दर्शन का होना अनिवार्य है। चारित्र का मुख्य अंग अहिंसा है, जिसे समझने के लिए पहले हिंसा के स्वरूप को जानना आवश्यक होता है। इस प्रकार हिंसा निषेधात्मक पक्ष है, जबकि मैत्री, करुणा, दया और आध्यात्मिक सेवा इसका सकार व विधेयात्मक पक्ष हैं। मोक्ष मार्ग के चार अंगों ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप में चारित्र निषेधात्मक, त्यागात्मक व संवरात्मक कर्मों का निरोध करने वाला है। जबकि तपस्या निर्जरा कराने वाला विधेयात्मक पक्ष है। तत्त्वार्थ सूत्र के अनुसार सम्यक दर्शन, ज्ञान और चारित्र ही मोक्ष मार्ग हैं, जहाँ तप को चारित्र के अंतर्गत ही समाविष्ट माना गया है। आगम में वर्णित चारित्र के पाँच भेद है – सामायिक, छेदोपस्थापनीय, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसंपराय और यथाख्यात इनमें से वर्तमान भरत क्षेत्र में व्यावहारिक रूप से सामायिक और छेदोपस्थापनीय चारित्र ही मुख्य रूप से प्रासंगिक हैं, जबकि शेष तीन भेद ज्ञेय श्रेणी में आते हैं। प्रथम एवं चौबीसवें तीर्थंकर के शासन में छेदोपस्थापनीय चारित्र का प्राधान्य रहता है, जबकि मध्य के बाईस तीर्थंकरों के काल एवं महाविदेह क्षेत्र में सामायिक चारित्र की ही प्रधानता पाई जाती है। किसी भी साधक को वीतरागता एवं मुक्ति की अवस्था तक पहुँचने के लिए सामायिक, सूक्ष्मसंपराय और यथाख्यात इन तीन चारित्रों के क्रमिक विकास से गुजरना अनिवार्य नियम है।
गुरुदेव ने आगे तात्विक व्याख्या करते हुए कहा कि चारित्र संपन्नता से जीव चौदहवें अयोगी केवली गुणस्थान रूप ‘शैलेश भाव’ को प्राप्त करता है। शैलेशी अवस्था को प्राप्त अनगार वेदनीय, आयु, नाम और गोत्र कर्म का पूर्ण क्षय करके समस्त दुखों का अंत कर देता है। जैसे दूध, चावल व चीनी के योग से खीर अथवा आटा, घी व चीनी के मेल से सिरा बनता है, वैसे ही सम्यक दर्शन, ज्ञान और चारित्र तीनों की युति से मोक्ष मार्ग पूर्ण होता है। मोक्ष की प्राप्ति के लिए विशाल विद्वत्ता, संस्कृत का ज्ञान, उत्कृष्ट वक्ता, साहित्यकार होना या शास्त्रों का कंठस्थ होना आवश्यक नहीं है। मुक्ति के लिए एकमात्र अनिवार्य शर्त कषाय मुक्ति, वीतरागता है। चाहे दिगंबर वेश हो या श्वेतांबर, गेरुआ वस्त्र हो या पीला, अथवा गृहस्थ वेश ही क्यों न हो, यदि कषाय मुक्ति निष्पन्न हो जाती है तो वह जीव उसी जीवन के पश्चात् मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

