surendra Munot Associate Editor all india
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लाडनूं ,तेरापंथ की राजधानी में निरंतर ज्ञान गंगा प्रवाहित करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शनिवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ व अन्य श्रद्धालुओं को आज के निर्धारित विषय ‘योग सत्य से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से वर्णित करते हुए कहा कि प्रश्न किया गया योग सत्य से जीव क्या प्राप्त करता है? जीवन में आत्मा नाम का तत्त्व है। इस जगत में मूल दो ही तत्त्व हैं आत्मा और शरीर। इन दो के सिवाय और कुछ नहीं है। आत्मा और शरीर संयुक्त रूप में हैं और इस संयुक्ति की निष्पत्ति है कि सक्रियता, वाणी, मन आदि सभी हैं। शरीर, वाणी और मन की प्रवृत्ति योग कहलाता है। आदमी प्रवृत्तिमान होता है।
साधु विहार करता है तो भी कोई न कोई विचार आ सकता है। भोजन करते समय भी कोई न कोई बात आ सकती है। आदमी सोता है तो भी उसके मन में अनेकानेक विचार आते रहते हैं। कभी चिंता का भाव तो कभी तनाव आदि भी हो सकता है। आदमी के मन में चिंता भी हो सकती है। वाणी की भी प्रवृत्ति होती है। अकेले में रहते हुए भी जप, स्वाध्याय आदि चलता है तो वाणी की प्रवृत्ति भी होती रहती है। शरीर की सहज प्रवृत्ति शरीर के भीतर चलती है और आदमी प्रयत्नपूर्वक बाह्य प्रवृत्ति भी करते हैं। इस प्रकार काय योग, वचन योग और मनोयोग प्राप्त होते हैं। बताया गया है कि योग सत्य से जीव योग को विशुद्ध बना लेता है।
सत्य शब्द बहुत ही प्रसिद्ध है। सबकुछ सत्य में प्रतिष्ठित है। सत्य की बहुत महिमा बताई गई है। सच्चाई शरीर और वाणी में ही नहीं, मन में भी रहे, ऐसा प्रयास करना चाहिए। आदमी मन से भी अयथार्थ में न जाए, वाणी से अयथार्थ न बोले और शरीर से भी अयथार्थ चेष्टा न करे। आदमी को धोखाधड़ी आदि से भी बचने का प्रयास करना चाहिए। सत्य के साथ भी सरलता रखने का प्रयास होना चाहिए।
वाणी से अच्छी बात बोलने, अच्छा व्याख्यान देने का प्रयास करना चाहिए। अपनी वाणी का अच्छा विकास करने का प्रयास करना चाहिए। दूसरों को ज्ञान देना भी कितनी अच्छी बात हो सकती है। शरीर की शोभा परोपकार से होती है। आदमी अपने शरीर से दूसरों पर उपकार करने का प्रयास करे। किसी को औषधि की आवश्यकता है तो उससे पूछकर दवाई आदि ले देना भी अच्छा परोपकार है। किसी बीमार व्यक्ति की जितनी सेवा हो सके, सेवा करने का प्रयास होना चाहिए। शरीर का अच्छा उपयोग करना शरीर की शोभा है।
योगों में सच्चाई रहे, ऐसा प्रयास करना चाहिए। मन में, वाणी में और शरीर की चेष्टा में भी सच्चाई रहे। सच्चाई के प्रति निष्ठा रहे। सच्चाई के रास्ते में परेशानियां आ सकती हैं, लेकिन विजय सच्चाई की ही होती है। कठिनाइयों को झेलने की हिम्मत रखने का प्रयास हो। इसलिए सच्चाई के प्रति आस्था होनी चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को उत्तरित किया। प्रेक्षाध्यान के शिविरार्थियों को आचार्यश्री शिविर के संदर्भ में उपसंपदा प्रदान की। कार्यक्रम के दौरान अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय सी.पी.एस. ट्रेनर कन्क्लेव का मंचीय उपक्रम रहा। इस संदर्भ में अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री पवन माण्डोत, सी.पी.एस. एकेडमी के चीफ ट्रेनर श्री अरविंद माण्डोत ने अपनी अभिव्यक्ति दी। युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री ने कन्क्लेव के संभागियों को पावन पाथेय प्रदान किया। इस उपक्रम का संचालन सी.पी.एस. एकेडमी के कनवेनर श्री दिनेश मरोठी ने किया। नेहल सुकलेचा ने आचार्यश्री से संस्था में बोधार्थी के रूप में प्रवेश करने की प्रार्थना की।

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