surendra Munot Associate Editor all india
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लाडनूं ,जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के दौरान उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘श्रोत्रेन्द्रिय निग्रह से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि चारित्र का संबंध इन्द्रिय निग्रह के साथ भी है। चारित्र को अति संक्षेप में कहा जाए तो जो समभाव है, वह चारित्र है। चारित्र का संबंध समभाव से है और समभाव का संबंध इन्द्रियों से भी है।
प्रत्येक संसारी जीव में इन्द्रियां होती हैं। मनुष्यों में पांच इन्द्रियां बताई गई हैं। इन्द्रिय के संदर्भ में बताया गया कि ऐश्वर्य सम्पन्न जीव जो इन्द्र है और उसका चिन्ह इन्द्रिय है। बिना इन्द्रिय के कोई जीव नहीं हो सकता। इस प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि इन्द्रिय के बिना छदमस्थ जीव नहीं और जीव के बिना इन्द्रिय नहीं। पांच प्रकार की इन्द्रियां होती हैं। आंख, कान, नाक, जिह्वा और त्वचा- ये ज्ञानेन्द्रियां हैं। इसी प्रकार भावेन्द्रियां भी होती हैं जो आत्मा के साथ जुड़ी हुई होती हैं। इसी प्रकार पांच कर्मेन्द्रियां भी हैं। ज्ञानेन्द्रियों में भी कामी और भोगी इन्द्रियों की बात बताई गई है। श्रोत्र और चक्षु को कामी इन्द्रिय और घ्राण, रसन और स्पर्शन भोगी इन्द्रियां कही जाती हैं। ये पांचों इन्द्रियां ज्ञान की भी माध्यम बनती हैं।
कितनी जानाकरियां कान के माध्यम से प्राप्त करते हैं। कितनी जानकारियां आंखों से देखकर प्राप्त करते हैं। इसी प्रकार नाक से सूंघकर, जिह्वा से स्वाद लेकर और स्पर्शन अर्थात् स्पर्श कर कितना ज्ञान किया जा सकता है, किन्तु ज्ञान प्राप्ति की सबसे सक्षम माध्यम से दो ही इन्द्रियां होती हैं- श्रोत्र और चक्षु। ये ज्ञान प्राप्ति के सक्षम साधन हैं। आदमी शब्द का भी उपयोग करता है और रूप का भी उपयोग करता है। आदमी साधना शब्द से भी करता है और रूप से भी उपासना करता है। उपासना शब्द से भी होती है और रूप से भी उपासना होती है। नवकार महामंत्र का जप करें अथवा भगवान महावीर का नाम लें तो वहां शब्द ही उपासना का आधार बनता है।
गुरु के समक्ष बैठकर उपासना होती है तो गुरु दृश्य हैं, उन्हें आंखों से दिखाई दे रहे हैं तो रूप की उपासना हो सकती है। इसी प्रकार शब्द अर्थात् मंत्र आदि के माध्यम से उपासना की जा सकती है। इस प्रकार शब्द भी मूर्त है और रूप भी मूर्त है। हम सभी मूर्त के माध्यम से अमूर्त की विनय भक्ति उपासना का प्रयास कर सकते हैं। यह शब्द और रूप की दुनिया है।
बताया गया कि श्रोत्रेन्द्रिय का निग्रह करने से राग-द्वेष का त्याग हो जाता है और इससे होने वाले कर्म बन्धन से भी आदमी बच सकता है। इससे पूर्व में बंधे हुए कर्म की निर्जरा भी होती है। श्रोत्रेन्द्रिय निग्रह करने के लिए आदमी को अनपेक्षित शब्दों को सुनने में लगाने से बचने का प्रयास करना चाहिए। अपेक्षित को सुनना भी हो तो उसमें राग-द्वेष की भावना से बचने का प्रयास करना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त सरदारशहर के गधैया परिवार के लोग संबल प्राप्ति हेतु उपस्थित थे। आचार्यश्री ने परिवार को आध्यात्मिक संबल प्रदान करते हुए मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।

