सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
Key Line Times
लाडनूं, डीडवाना-कुचामन (राजस्थान) ,लाडनूं के जैन विश्व भारती में विराजमान हो चुके जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के चरणों में नित्य प्रति श्रद्धा का सैलाब उमड़ रहा है। श्रद्धालुओं की संख्या के साथ-साथ साधु-साध्वियों की संख्या भी बढ़ रही है। यह बढ़ती संख्या मानों भक्ति की भावना को भी वृद्धिंगत कर रही है। जन-जन के मानस में आध्यात्मिक उल्लास छाया हुआ है। सुधर्मा सभा में प्रवचन के दौरान श्रद्धालुओं की विशाल उपस्थिति इस बात को और अधिक पुष्ट बना रही है। रविवार को सुधर्मा सभा में मंगल प्रवचन के दौरान नवदीक्षित साध्वीजी की बड़ी दीक्षा (छेदोपस्थापनीय चारित्र) का भी क्रम रहा। इस संदर्भ में आचार्यश्री ने नवदीक्षित साध्वीजी को आर्षवाणी का उच्चारण करते हुए बड़ी दीक्षा प्रदान करते साथ-साथ नवदीक्षित समणीजी को समणी जीवन को अच्छा बनाने की प्रेरणा प्रदान की।रविवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित जनता को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि संसार में आसक्ति और अनासक्ति की बात होती है। शरीर है और शरीर को टिकाने का लक्ष्य होता है तो आदमी को प्रवृत्ति भी करनी होती है। शरीर को टिकाने के लिए पुरुषार्थ भी करना होता है। शरीर को ढकने के लिए वस्त्र आदि पहनने होते हैं। शरीर के लिए शिक्षा, चिकित्सा आदि-आदि की आवश्यकता होती है। प्रवृत्ति है और पदार्थ के साथ जुड़ाव होता है तो वहां आसक्ति की बात भी होती है। इस दृष्टि से आदमी बंधन में आ जाता है। पूर्णतया अनासक्ति का भाव हो जाए, तो बहुत अच्छी बात हो सकती है।
कर्मों के बंधन में दो तत्त्वों का योगदान होता है-कषाय और योग। प्रकृति बंध व प्रदेश बंध का संबंध मुख्यतया योग के साथ होता है और स्थिति व अनुभाग बंध का संबंध कषाय के साथ होता है। आदमी को कोई भी कार्य करे, किन्तु उसमें उसको ज्ञाता-द्रष्टा भाव रखना व राग-द्वेष का भाव नहीं रखने का प्रयास हो तो पाप कर्मों का बंधन नहीं होता। आदमी जो भी कार्य करे, उसमें मोह न हो, राग न हो, आसक्ति न हो और अनासक्ति की भावना का विकास हो, ऐसा प्रयास होना चाहिए। राग-द्वेष का भाव ही बंधन का बड़ा कारण बन सकता है। जिन प्राणियों का मन होता है, ज्यादा पाप का बंधन उन्हीं को होता है। उसी प्रकार जिस प्राणी के मन होता है, वे ही ज्यादा धर्म की साधना कर सकते हैं। मनुष्य मन वाला प्राणी है, इसलिए वह धर्म की बहुत ऊंची साधना कर सकता है, बहुत ज्यादा पुण्य का बंध कर सकता है तथा कभी मोक्ष को भी प्राप्त कर सकता है।
मन होने के कारण राग-द्वेष के भाव भी उभर सकते हैं औन मन वाले प्राणी वीतरागता को भी प्राप्त कर सकते हैं। हम मनुष्यों को अपने मन को पवित्र और सुमन बनाने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को मन के योग को अच्छा रखने का प्रयास करना चाहिए। कल्याणकारी व पवित्र संकल्प रहे, बुरे विचार न आएं, इसका प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार आदमी अनासक्ति की साधना का प्रयास करे, यह काम्य है।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने हनुमानगढ़ टाउन से चतुर्मास कर कई वर्षों बाद गुरु सन्निधि में पहुंची आदि साध्वियों को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। आज कार्यक्रम के दौरान बड़ी दीक्षा (छेदोपस्थापनीय चारित्र) का भी उपक्रम रहा, जिसमें नवदीक्षित साध्वी सुकृतप्रभाजी को आचार्यश्री ने आर्षवाणी का उच्चारण करते हुए छेदोपस्थापनीय चारित्र प्रदान किया तथा सात दिन पूर्व ही नवदीक्षित समणी गीतप्रज्ञाजी को समणी जीवन के संदर्भ में प्रेरणा प्रदान की। नवदीक्षितों ने आचार्यश्री को सविधि वंदन किया।
आचार्यश्री के स्वागत एवं अभ्यर्थना का क्रम आज भी अनवरत जारी रहा। इस आयोजन में हनुमानगढ़ टाउन में चतुर्मास कर गुरु सन्निधि में पहुंची साध्वी सूरजप्रभाजी ने गुरुदर्शन से प्राप्त आह्लादित भावों को अभिव्यक्ति देते हुए अपनी सहवर्ती साध्वियों के साथ गीत का संगान किया। ऊर्जा कांटेड़ ने पारमार्थिक शिक्षण संस्था में प्रवेश से पूर्व आचर्यश्री से मंगलपाठ का श्रवण किया। जैन विश्व भारती के मंत्री श्री सलिल लोढ़ा ने आचार्यश्री की सन्निधि में प्रारम्भ हो रहे चित्त समाधि शिविर के संदर्भ में जानकारी दी।

जल संसाधन और जल आपूर्ति मंत्री श्री ईश्वरसिंह पटेल ने डांग की घाणा समूह जल आपूर्ति योजना का स्थल निरीक्षण किया 