सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
Key Line Times
राजस्थान,लाडनूं, डीडवाना-कुचामण (राजस्थान)
जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने, अहिंसा यात्रा के माध्यम से जन-जन में सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की अलख जगाने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल प्रवास से लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती नवीन आध्यात्मिक अलोक से आलोकित हो रही है। आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में साधु-साध्वियों के पहुंचने का क्रम भी जारी है तो प्रवचन कार्यक्रम के दौरान उनकी अभ्यर्थना का क्रम भी अनवरत चल रहा है। शुक्रवार को आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में राजस्थान मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस श्री जी.आर. मूलचन्दानी भी उपस्थित हुए। उन्होंने आचार्यश्री के दर्शन करने के उपरान्त मंगल प्रवचन का श्रवण भी किया तथा अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति भी दी।
शुक्रवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगल प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि शास्त्र में एक चिंतन दिया गया है कि थोड़े लाभ के लिए ज्यादा नुकसान नहीं उठाना चाहिए। थोड़े लाभ के लिए बहुत का नुकसान उठाने को विचार मूढ़ता भी कहा जाता है। वह उस आदमी की नासमझी होती है।
आदमी को अपने जीवन में यह ध्यान देना चाहिए कि किसी कार्य से लाभ कितना और हानि कितनी। आदमी को सामान्यतया वैसे कार्य करने से बचने का प्रयास करना चाहिए, जिसमें लाभ थोड़ा और हानि ज्यादा होती हो। जैसे कोई साधु है। तपस्या करता है, संयम की साधना करता है और वह विचार करता है कि मेरी तपस्या का मुझे ऐसा फल मिले कि मैं अगले जन्म में चक्रवर्ती राजा बन जाऊं। जो अपनी तपस्या का निदान कर लेता है, वह उस अनुसार बन भी जाए, लेकिन कितनी बढ़ती मूढ़ता की बात होती है कि जो साधना, तपस्या मोक्ष को प्रदान करने वाली होती है, उसे भौतिक लाभ के लिए खो दिया। साधु को अपनी तपस्या, साधना का मुख्य लक्ष्य तो मोक्ष की प्राप्ति का रखना चाहिए, उसे अल्प भौतिक लाभ के लिए खोना वैचारिक मूढ़ता की बात हो जाती है। यह नासमझी मानों उसी प्रकार होती है, जिस प्रकार कोई मूढ़ आदमी कौड़ी के दामों में बहुमूल्य हीरे को बेंच देता है।
इसलिए आदमी को यह ध्यान देना चाहिए कि आध्यात्मिक साधना का बहुत लाभ होता है, उसे भौतिक कामना अथवा लालसा में नहीं खोना चाहिए। अध्यात्म व धर्म की साधना को नितांत मोक्ष के लिए रखा जाता है तो वह उसके लिए ज्यादा लाभदायी अथवा हितकर बात हो सकती है। भौतिकता एक चीज है और आध्यात्मिकता अलग व विशेष बात है। साधु के मन में तो भौतिकता की आकांक्षा का विकास ही नहीं होना चाहिए। अध्यात्म बहुत ऊंची बात होती है।
गृहस्थ जीवन में रुपया-पैसा, धन, संपत्ति, औलाद आदि एक बात हो सकती है, लेकिन अहिंसा, संयम, साधना, तपस्या जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि होती है। आदमी के जीवन में रुपया, पैसा, धन-दौलत का ज्यादा महत्त्व नहीं, बल्कि उस आदमी के जीवन का बहुत महत्त्व होता है, जिसके जीवन में सद्गुणों का आधिक्य हो। आदमी को अपने जीवन में सद्गुणों रूपी आभूषणों का विकास करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी के संयम, साधना, आध्यात्मिक परोपकार की भावना कितनी है, अहिंसा की कितनी भावना है और उसका चारित्र कैसा है, यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात होती है। इसलिए बाहर के आभूषण न भी हों, किन्तु जीवन में सद्गुणों का आभूषण होता है, जीवन उन्नत होता है। इसलिए आदमी को सद्गुणों के आभूषणों का विकास करने का प्रयास करना चाहिए। पैसे के लोभ के कारण ईमानदारी को खो देना बहुत बड़े नुकसान की बात होती है। ज्यादा धनवान बनने के लिए ईमानदारी का नाश कर बेइमानी करना भी थोड़े के लिए ज्यादा का नुकसान वाली जैसी बात हो जाती है। इसलिए आदमी को अपने जीवन में आध्यात्मिक संपदा का विकास करने का प्रयास करना चाहिए।
आज आचार्यश्री की अभ्यर्थना में साध्वी स्वर्णरेखाजी ने अपने हृदयोद्गार व्यक्त करते हुए अपनी सहवर्ती साध्वियों संग गीत का संगान किया। साध्वी विनयश्रीजी की सहवर्ती साध्वीजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। समणी कुसुमप्रज्ञाजी ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में पहुंचे राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष श्री जस्टिस जी.आर. मूलचन्दानी ने आचार्यश्री के दर्शन करने के उपरान्त अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति देते हुए कहा कि परम आदरणीय पूज्य आचार्यश्री महाश्रमणजी को सादर नमन करता हूं। आज आपके दर्शन कर स्वयं को अनुग्रहित महसूस कर रहा हूं। आचार्यश्री ने उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।

जल संसाधन और जल आपूर्ति मंत्री श्री ईश्वरसिंह पटेल ने डांग की घाणा समूह जल आपूर्ति योजना का स्थल निरीक्षण किया 