सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
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लाडनूं, डीडवाना-कुचामण (राजस्थान) ,तेरापंथ की राजधानी के रूप में ख्यापित लाडनं की धरा स्थित जैन विश्व भारती के नव्य-भव्य परिसर में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी विशाल धवल सेना के साथ योगक्षेम वर्ष के लिए प्रवासित हो चुके हैं। आचार्यश्री के लम्बे प्रवास का लाभ उठाने के लिए लाडनूं के अप्रवासी श्रद्धालु भी अपने गांव में पहुंच गए हैं। इसके साथ-साथ जैन विश्व भारती परिसर में बने अनेक नए भवनों में आदि में देश-विदेश से श्रद्धालु भी आने प्रारम्भ हो गए हैं। इस कारण जैन विश्व भारती परिसर ही नहीं, पूरा लाडनूं नगर गुलजार बना हुआ है। आचार्यश्री के शुभागमन के संदर्भ में जैन विश्व भारती परिसर में एक नए-नए आयामों से संदर्भित भवन, पार्क, वाटिका आदि का निर्माण हुआ है, जहां आचार्यश्री नए-नए स्थानों में पधार कर उसे अपनी पावन चरणरज से आलोकित कर रहे हैं। यह सौभाग्य प्राप्त कर संदर्भित लोग अत्यंत आनंद की अनुभूति कर रहे हैं।
बुधवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि साधु का जीवन उच्च कोटि का होता है। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के साधुओं की जो आचार, मर्यादा, व्यवस्थाओं का सम्यक् पालन होता है तो वह साधु एक उच्च कोटि का साधु बन सकता है। साधु के लिए पांच महाव्रत बहुत बड़ी सम्पत्ति होती है। ये महाव्रत इस प्रकार हैं- सर्व प्राणातिपात विरमण, सर्व मृषावाद विरमण, सर्व अदत्तादान विरमण, सर्व मैथुन विरमण और सर्व परिग्रह विरमण। संक्षेप में कहें तो अहिंसा, सत्य अचौर्य, ब्रह्मचर्य व अपरिग्रह। ये साधु के पांच महाव्रत होते हैं। ये पांच महाव्रत कितने संयमयुक्त होते हैं कि साधु को छोटी-छोटी हिंसा से भी विरत रहने का प्रयास करे और अहिंसा का पूर्ण ध्यान रखे। पांच प्रकार के स्थावर जीवों के प्रति भी साधु को अहिंसा रखने की प्रेरणा दी गई है।
साधु की अहिंसायुक्त साधना बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। साधु को तो प्रमाद से बचने का प्रयास करना चाहिए। साधु के लिए सूक्ष्म जीवों की विराधना से बचने की प्रेरणा दी जाती है। जितना संभव हो जीव हिंसा से बचने का प्रयास करना चाहिए। साधु जागरूक है, अप्रमत्त है और चल रहा है, इस दौरान सहसा कोई जीव मर भी जाता है तो साधु पाप का भागीदार नहीं होता। यदि वह प्रमाद में है और जीव नहीं मरा तो भी साधु को पाप कर्म का बंध होता है। दूसरा महाव्रत है- सर्वमृषावाद विरमण। साधु के लिए तो यहां तक नियम है कि किसी का भला करने के लिए साधु को झूठ नहीं बोलना चाहिए। क्रोध, लोभ, भय और हास्य में भी साधु को झूठ नहीं बोलना चाहिए।
तीसरा महाव्रत है- सर्व अदत्तादान विरमण। साधु को छोटी चोरी भी करने से बचना चाहिए। छोटी चीज भी है तो संबंधित व्यक्ति से पूछना चाहिए। इसी प्रकार चौथा महाव्रत सर्व मैथुन विरमण है तथा पांचवां महाव्रत है-सर्व परिग्रह विरमण। रुपया-पैसा, बैंक बैलेंस, जगह, जमीन, मकान, दुकान आदि साधु के मालिकाना में कुछ नहीं होना चाहिए। यह बहुत बड़ा त्याग है। धर्मोपकरणों की भी सीमा की गई है कि साधु को सीमा से अधिक कपड़ा नहीं रखना। इस प्रकार यह सारा साधु का आचार है। इसके बाद हमारे धर्मसंघ की मर्यादाएं हैं। एक आचार्य की आज्ञा में रहना, महाव्रत, समितियों और गुप्तियों का पालन करना अनिवार्य होता है। संघीय मर्यादाओं का पालन करने का प्रयास करना चाहिए। मर्यादाओं से साधुत्व की रक्षा हो सकती है। आचार और मर्यादाओं के अंतर्गत रहते हुए साधु का कल्याण हो सकता है। साधु अपनी चर्या के प्रति जागरूक रहे तो वह उसके लिए लाभकारी हो सकता है।
साध्वी बसंतप्रभाजी व साध्वी सुदर्शनाश्रीजी ने संयुक्त प्रस्तुति दी। साध्वी संघप्रभाजी, साध्वी प्रणवप्रभाजी व साध्वी जिनबालाजी ने गुरु सन्निधि में अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। कार्यक्रम में आचार्यश्री प्रेक्षाध्यान शिविर में भाग लेने वालों को उपसंपदा भी प्रदान की।

