सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
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लाडनूं, डीडवाना-कुचामण (राजस्थान),जैन विश्व भारती, लाडनूं में युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में आज एक भावपूर्ण एवं ऐतिहासिक दीक्षा समारोह संपन्न हुआ। योगक्षेम वर्ष के दीर्घकालीन प्रवास के अंतर्गत यह प्रथम दीक्षा समारोह आयोजित हुआ। दीक्षा समारोह में पूज्यप्रवर द्वारा मुमुक्षु सलोनी नखत को साध्वी दीक्षा तथा मुमुक्षु खुशी सुराणा को समणी दीक्षा प्रदान की गई। दीक्षा संस्कार के पश्चात आचार्यश्री ने मुमुक्षु सलोनी नखत का आध्यात्मिक नामकरण करते हुए साध्वी सुकृतप्रभा एवं मुमुक्षु खुशी सुराणा का नामकरण समणी गीतप्रज्ञा नाम प्रदान किया। दीक्षा समारोह की एक विशेष और विरल विशेषता यह रही कि मुमुक्षु सलोनी नखत की दीक्षा की घोषणा मात्र दो घंटे पूर्व ही हुई। इतने अल्प समय में दीक्षा की घोषणा एवं तत्क्षण दीक्षा संपन्न होना विरल अवसर पर ही ऐसा होता है। यह प्रसंग वैराग्य की तीव्रता एवं गुरुकृपा का सजीव उदाहरण बना।
मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में निर्धारित समय पर दीक्षा समारोह का शुभारंभ हुआ। आचार्य प्रवर द्वारा दीक्षार्थियों से प्रश्नोत्तर कर उनका परीक्षण किया गया। आगम वाणी के उच्चारण के साथ ही कुछ क्षण पूर्व तक संसारी जीवन में स्थित मुमुक्षु, संयम जीवन में प्रविष्ट हो गईं। उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं की परिषद ने ‘मत्थेण वन्दामि’ के घोष के साथ नवदीक्षितों को वंदन किया।
दीक्षा संस्कार के अंतर्गत साध्वी दीक्षा का केशलोचन संस्कार, आचार्यश्री की आज्ञा से साध्वीप्रमुखाश्री विश्रुतविभा जी द्वारा संपन्न हुआ। इसके पश्चात धर्मध्वज ‘रजोहरण’ नवदीक्षित साध्वीश्री को प्रदान किया गया। उल्लेखनीय है कि जैन विश्व भारती, लाडनूं में चल रहे योगक्षेम वर्ष प्रवास के दौरान यह पहला दीक्षा समारोह है।
मंगल देशना में गुरुदेव ने कहा – हमारे ३२ आगमों में से दशवैकालिक सूत्र एक मूल आगम है, जो साधु-साध्वियों के लिए अत्यंत स्मरणीय और मननीय है। साधु को कैसे बोलना चाहिए, गोचरी की विधि क्या हो और भिक्षु के लक्षण क्या हैं, यह जानने के लिए यह आगम बहुत महत्वपूर्ण है। साधु-साध्वियों और समणियों को यह आगम कंठस्थ रहना चाहिए, साथ साथ इसका परायण भी होता रहे। यदि रोज पूरा न हो सके, तो सप्ताह में एक बार इसका पारायण अवश्य कर लें।
गुरुदेव ने आगे कहा कि अभी परम पूजनीय आचार्य श्री भिक्षु का ३००वां जन्म वर्ष “भिक्षु चेतना वर्ष” चल रहा है। दशवैकालिक के दसवें अध्ययन में भी बार-बार ‘भिक्खू-भिक्खू’ शब्द आता है। हमें उस अध्ययन में बताई गई बातों को आत्मसात कर तेजस्वी सन्यास और साधना का जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए। इसके साथ ही, साधु-साध्वियों, समणियों और मुमुक्षुओं में सेवा का भाव भी रहना चाहिए। अपनी शारीरिक और बौद्धिक सक्षमता का उपयोग दूसरों के सहयोग और धर्म संघ की प्रभावना के लिए करना चाहिए, क्योंकि सक्षमता की सार्थकता तभी है जब उसका अच्छा उपयोग होता रहे।
सेवाकेंद्रों के संदर्भ में फरमाते हुए गुरुदेव ने कहा कि छापर का संत सेवा केंद्र अब जैन विश्व भारती सेवा केंद्र में विलीन हो गया है। गुरुदेव ने उग्रविहारी तपोमूर्ति मुनि श्री कमलकुमार जी को लाडनूं सेवा केंद्र के लिए नियुक्त किया। योगक्षेम वर्ष के अंतर्गत प्रेक्षाध्यान और तत्वज्ञान के प्रशिक्षण के उपक्रम भी चलेंगे। इस हेतु ‘योगक्षेम वर्ष कैलेंडर’ और ‘मार्गदर्शिका’ इन दो पुस्तिकाओं का विमोचन हुआ है। गुरुदेव ने पुस्तिका के संदर्भ में प्रेरणा प्रदान की।
कार्यक्रम में साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी ने सारगर्भित उद्बोधन प्रदान किया। दीक्षा समारोह के संदर्भ में मुमुक्षु चंदन ने दीक्षार्थी बहनों का परिचय प्रस्तुत किया। मुमुक्षु खुशी सुराणा ने अपने विचारों की अभिव्यक्ति दी। परमार्थिक शिक्षण संस्था से मोतीलाल जीरावाला ने आज्ञा पत्र का वाचन किया। दीक्षार्थियों के पारिवारिक जनों ने पत्र गुरू चरणों में अर्पित कर अपनी अनुमति व्यक्त की।
मंच संचालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया।
आज के इस अवसर पर बहिर्विहार से मुनि सुमति कुमार जी, साध्वी तिलकश्री जी, साध्वी कनकरेखा जी, साध्वी स्वर्णरेखा जी का ग्रुप गुरू चरणों में पहुंचा। योगक्षेम वर्ष को लेकर अन्य क्षेत्रों से लगातार साधु – साध्वियों के आने का क्रम जारी है।

