सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
Key Line Times
मंगलपुरा, डीडवाना-कुचामण (राजस्थान) ,जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी बुधवार को शिमला से प्रातःकाल अपनी धवल सेना के साथ गतिमान हुए। आचार्यश्री दिन-प्रतिदिन लाडनूं के सन्निकट होते जा रहे हैं। लाडनूं के जैन विश्व भारती में युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी योगक्षेम वर्ष के 6 फरवरी को महामंगल प्रवेश करेंगे। बुधवार को आचार्यश्री अपनी धवल सेना के साथ करीब तेरह किलोमीटर का विहार कर मंगलपुरा में स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में पधारे। इससे पूर्व मार्ग में बहिर्विहार से पधारे मुनि कमलकुमारजी व मुनि जयकुमारजी आदि संतों ने आचार्यश्री के दर्शन किए। बहिर्विहार से गुरु सन्निधि में पहुंचे संतों ने आचार्यश्री को विधिवत वंदन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया।
विद्यालय परिसर में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित जनता को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि जीवन में दो तत्त्व हैं- आत्मा और शरीर। दोनों की प्रकृति भिन्न-भिन्न है। आत्मा चैतन्य है तो वहीं शरीर जड़ है। इन दोनों का मिश्रित रूप जीव का जीवन होता है। कोरी आत्मा है, तो वहां भी शरीर, वाणी और मन वाला जीवन नहीं होता। जहां शरीर नहीं होता तो वहां श्वास आदि की प्रक्रिया भी नहीं होती। जहां कोरा शरीर है, वहां भी जीवन नहीं होता। पार्थिव देह में जीवन नहीं होता। यह एक सामान्य बात है। जीवन वहीं होता है जहां आत्मा और शरीर दोनों का मिश्रण होता है। जहां आत्मा शरीर से निकल गई, वहां मृत्यु और जहां आत्मा और शरीर का संबंध हमेशा-हमेशा के लिए छूट गया, वहां मोक्ष की बात हो जाती है। जीवन में शरीर भी है और आत्मा भी है।
शास्त्र में इस शरीर को नौका कहा गया है। इसके माध्यम से भव सागर को तरने के लिए इस शरीर का नौका के रूप में उपयोग किया जा सकता है। शरीर रूपी नौका निश्छिद्र हो, ऐसा प्रयास करना चाहिए। शरीर रूपी नौका में आश्रव छेद के समान होते हैं, जिनमें से कर्म पुद्गलों का आगमन होता है, वह शरीर इस भव सागर को पार नहीं कर सकती। जीव इस शरीर का नाविक है, यह संसार भव सागर है, मनीषी इसे तर जाते हैं।
इस शरीर के माध्यम से संयम और तप की साधना की जाए तो यह शरीर रूपी नौका भव सागर से पार उतारने वाली होती है। यह मानव जीवन दिन-प्रतिदिन बीत रहा है। शरीर स्वस्थ और सक्षम रहे, तब तक आदमी को धर्म, संयम, आराधना व साधना के माध्यम से भव सागर को तर लेने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि अब जैन विश्व भारती, लाडनूं निकट है। परम पूज्य गुरुदेव तुलसी लाडनूं में कितने विराजे और वहां कितने चतुर्मास किए। लाडनूं में लम्बा प्रवास निर्धारित है। साधु-साध्वियां भी पहुंच रहे हैं। आज मुनिश्री कमलकुमारजी स्वामी, मुनिश्री श्रेयांसकुमारजी स्वामी ठाणा-4 गंगाशहर चतुर्मास व लम्बा प्रवास करके पधारे हैं। उधर मुनि जयकुमारजी भी दो संत पधार गए हैं। खूब अच्छी धर्मप्रभावना होती रहे।
मुनि श्रेयांसकुमारजी ने अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति देते हुए गीत का संगान किया। मुनि कमलकुमारजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति देते हुए अपने सहवर्ती संतों के साथ गीत को प्रस्तुति दी। मुनि जयकुमारजी ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी।

