surendra Munot
Associate Editor all india
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लाडनूं ,भाद्रव शुक्ला द्वादशी। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के सप्तमाचार्य डालगणी का 118वां महाप्रयाण दिवस। बुधवार को प्रातः जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी, युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी सहित जैन विश्व भारती परिसर से लाडनूं नगर में स्थित उनके समाधि स्थल पहुंचे। आचार्यश्री ने वहां पहुंचकर कुछ समय तक ध्यान का प्रयोग किया। कुछ समय पश्चात आचार्यश्री वहां से प्रस्थान कर आचार्यश्री डालगणी के पदाभिषेक स्थल के बाद साध्वियों के पुराने ठिकाणे सेवा मन्दिर में पहुंचे। जहां निवासित साध्वीवृंद को अपने वर्तमान आराध्य के दर्शन व उपासना का अवसर प्राप्त हुआ। तदुपरान्त आचार्यश्री पुनः जैन विश्व भारती परिसर में स्थित अपने प्रवास स्थल में पधारे और कुछ ही समय पश्चात सुधर्मा सभा में प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में पधारे।
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘तेजस्वी आचार्यश्री डालगणी’ को व्याख्यायित करते हुए कहा कि विकास के लिए अनुशासन एक उपाय है और अध्यात्म जगत में आत्मानुशासन एक गहरा तत्त्व है। अपने से अपना अनुशासन हो तो यह अध्यात्म की साधना है। राष्ट्र हो, विद्या संस्थान हो, सामाजिक संगठन हो अथवा धार्मिक संगठन हो, अनुशासन का महत्त्व सभी जगह होता है। राष्ट्र में अनुशासन न हो और संविधान का पालन भी न हो, और महत्त्वाकांक्षा ज्यादा हो तो उस राष्ट्र को बर्बाद होने से कोई रोक नहीं सकता। इसी प्रकार जो स्वयं शिष्य नहीं बन सकता, दूसरों को क्या शिष्य बना पाएगा।
आज भाद्रव मास की शुक्ल पक्षीय द्वादशी है। तेरापंथ धर्मसंघ के एक अनुशास्ता से जुड़ी हुई तिथि है। तेरापंथ धर्मसंघ के सप्तम आचार्यश्री डालगणी की आज वार्षिक महाप्रयाण तिथि है। वि.सं. 1966 को इसी लाडनूं में उनका चतुर्मास था। आज की तिथि को उनका महाप्रयाण हो गया था। आज उसका 118वां वर्ष प्रारम्भ हो रहा है। डालगणी हमारे धर्मसंघ के एक तेजस्वी आचार्य के रूप में ख्यापित हैं। जब किसी व्यक्ति में विशेष बात होती है तो वह तेजस्वी बन सकता है। हमारे धर्मसंघ में आचार्य तो सर्वोपरि होते हैं। उनके ऊपर शासन व्यवस्था का मानों पूरा भार होता है। विहार-चतुर्मास कहां कराना, उत्तराधिकारी किसे बनाना, साध्वीप्रमुखा किसे बनाना, यह सारे कार्य आचार्य के मौलिक अधिकार के रूप में प्राप्त हैं। आचार्य चतुर्विध धर्मसंघ के अनुशास्ता होते हैं। धार्मिक चर्या से संबंधी बातों में आचार्य श्रावक-श्राविकाओं के भी अनुशास्ता होते हैं।
तेरापंथ धर्मसंघ के सप्तमाचार्य एकमात्र ऐसे आचार्य हैं, जो उज्जयिनी नगरी से जुड़े हुए हैं। आचार्यश्री डालगणी के साथ मेरे साथ दो संबंध जुड़ते हैं। डालगणीजी की दीक्षा भी एक मुनिजी के द्वारा ही हुई, वे न आचार्य बने और न ही युवाचार्य बने और मुनि अवस्था में ही प्रयाण को प्राप्त हुए। मुनिश्री हीरालालजी स्वामी ने उन्हें दीक्षा प्रदान की और मैं मुनिश्री सुमेरमलजी स्वामी (लाडनूं) के द्वारा दीक्षित हूं। तेरापंथ की आचार्य परंपरा में आचार्यश्री डालगणी और मैं दो ही ऐसे हैं जो मुनिश्री के द्वारा दीक्षित हुए। दूसरी तिथि का संबंध है। भाद्रव शुक्ला द्वादशी आचार्यश्री डालगणी के महाप्रयाण का दिवस है और मेरे लिए युवाचार्य पद प्राप्ति का दिवस है। आज के ही दिन आचार्यश्री महाप्र्रज्ञजी ने मुझे युवाचार्यश्री के रूप में घोषित किया था।
आचार्यश्री डालगणी हमारे धर्मसंघ के विलक्षण आचार्य थे। सामान्यतया आचार्य पूर्वाचार्यों द्वारा नियुक्त होते हैं, लेकिन आचार्यश्री डालगणी किसी पूर्वाचार्य द्वारा घोषित नहीं थे, वे एक मुनिश्री द्वारा मनोनीत या धर्मसंघ द्वारा घोषित आचार्य थे। वे मुनिश्री थे मुनिश्री कालूजी स्वामी (रेलमगरा) थे। आज की तिथि में मैं डालगणी से जुड़े तीनों स्थानों से होकर आया हूं। वे धर्मसंघ को एक संकटकाल में प्राप्त हुए थे। उन्होंने तीन प्रभावक यात्रा कच्छ क्षेत्र में की। उन्होंने अपने उत्तराधिकारी का निर्णय को परोक्ष रूप में ही रखा। उन्होंने मुनिश्री कालूरामजी (छापर) को अपना उत्तराधिकारी बनाया। भाद्रव शुक्ला द्वादशी को ही तेरापंथ के प्रथम आचार्यश्री भिक्षु स्वामी ने अनशन स्वीकार किया था। आचार्यश्री डालगणी का आज के दिन महाप्रयाण हुआ तथा आज के ही दिन आचार्यश्री महाप्रज्ञजी ने अपने उत्तराधिकारी की घोषणा की। मुझे आज के दिन युवाचार्य पद गंगाशहर में प्रदान किया और अपनी अमल-धवल चद्दर मुझे ओढाई थी। आचार्यश्री डालगणी ने अपने ढंग से संघ में अनुशासन बनाए रखा। आचार्यश्री ने आचार्यश्री डालगणी पर आधारित गीत का संगान किया। आचार्यश्री ने आगे कहा कि कल भाद्रव शुक्ला तेरस आचार्यश्री भिक्षु स्वामी का चरमोत्सव है। भक्ति और अध्यात्म के रूप में उसे मनाने का प्रयास होना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल के अधिवेशन के दूसरे दिन भी आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में मंचीय उपक्रम आयोजित हुआ। अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल की मुख्य न्यासी श्रीमती कनक बरमेचा ने अपनी अभिव्यक्ति दी। राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सुमन नाहटा ने अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने मंगल आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहा कि अधिवेशन से संभागियों को अच्छी खुराक मिले, वह अच्छी बात है। अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल तेरापंथ समाज में महिलाओं की दृष्टि से प्रतिनिधि संस्था है। महिला समाज का, श्राविका समाज का विकास भी देखने को मिल रहा है। महिला मण्डल द्वारा संचालित पाठ्यक्रम में कितनी साध्वियां जुड़ी हुई हैं। तत्त्वज्ञान व तेरापंथ दर्शन एक अच्छा उपक्रम है। अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल खूब अच्छा विकास करती रहे। इसे साध्वीप्रमुखाजी के मार्गदर्शन, निर्देशन मिलता रहे, मंगलकामना।

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