
सुरेंद्र मुनोत,राष्ट्रीय सहायक संपादक
Key Line Times
उदयपुर (राजस्थान) ,जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ की जन्मस्थली के रूप में विख्यात मेवाड़ क्षेत्र में तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ आध्यात्मिकता की अलख जगा रहे हैं। इन यात्रा के दौरान आचार्यश्री उन क्षेत्रों मंे भी पधार रहे हैं, जहां 40-42 वर्ष पूर्व कभी आचार्यश्री तुलसी पधारे थे। इतने वर्षों बाद अपने आराध्य को अपने क्षेत्र में पाकर जनता हर्षविभोर है। राजस्थान की सीमा प्रारम्भ होने के साथ ही सर्दी का प्रभाव भी दिखाई देने लगा है। आचार्यश्री जैसे-जैसे आगे बढ़ते जा रहे हैं, सर्दी का मौसम लोगों को गर्म कपड़ों से तन को ढकने के लिए मजबूर कर रहा है, किन्तु मौसम की अनुकूलता-प्रतिकूलता से विरत युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी जनकल्याण के लिए निरंतर गतिमान हैं।शुक्रवार को प्रातःकाल की मंगल बेला में सूर्योदय के पश्चात युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने ऋषभदेव गांव से मंगल प्रस्थान किया। ऋषभदेववासियों ने मानवता के मसीहा के प्रति अपनी कृतज्ञता अर्पित की तो आचार्यश्री ने जनता को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। मार्ग में स्थान-स्थान पर श्रद्धालुओं ने समूह रूप में दर्शन कर आचार्यश्री से मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। कितने-कितने ग्रामवासियों को सहज ही महामानव के दर्शन का अवसर प्राप्त हो रहा है। इस क्षेत्र में राजमार्ग का पथ भी उतार-चढ़ाव युक्त बना हुआ है। करीब 15 किलोमीटर का विहार सम्पन्न कर शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी परसाद गांव में स्थित ऋषभ पब्लिक उच्च माध्यमिक विद्यालय में पधारे।युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के दौरान समुपस्थित जनता को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि कर्मवाद का सिद्धांत है का सार है कि आदमी को अपने द्वारा कृत कर्मों का फल भी भोगना होता है। इसलिए अपनी आत्मा के कल्याण के लिए आदमी को पाप कर्मों से बचने का प्रयास करना चाहिए। हिंसा, हत्या, झूठ, चोरी आदि-आदि अठारह पाप होते हैं। इन सभी पापों के सेवन से आदमी को बचने का प्रयास करना चाहिए।जहां तक संभव हो सके आदमी अपनी ओर से किसी का बुरा करने के इरादे से कोई कार्य नहीं करना चाहिए। आदमी को अपने जीवन यथासंभवतया पापों से बचाने का प्रयास करना चाहिए। पापों से आदमी जितना बच सकेगा, कर्मबन्धनों से भी बचाव हो सकता है। आदमी को अपने जीवन में किसी का बुरा नहीं करना चाहिए। जितना संभव हो सके, किसी के कल्याण का प्रयास करना चाहिए।मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने कहा कि आज मुनि सुब्रतकुमारजी स्वामी केलवा में चतुर्मास कर मार्ग मंे मिलना हुआ है। हमारे बीसवें तीर्थंकर का नाम है। भक्ति में गीत भी गाते हैं, संघ-संघपति के प्रति भक्ति का भाव है। आचार्यश्री की अनुज्ञा से मुनि सुब्रतकुमारजी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति देते हुए गीत का संगान किया। मुनि शुभमकुमारजी ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी।अखण्ड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी ने लगभग 6 किलोमीटर का सान्ध्यकालीन विहार करते हुए बारां स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में पधारे। आचार्यश्री का रात्रिकालीन प्रवास यही हुआ।

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