
सुरेन्द्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
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10.03.2026, मंगलवार, लाडनूं,तेरापंथ धर्म की राजधानी लाडनूं में 11 वें अनुशास्ता युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में 350 से अधिक साधु साध्वियों के प्रवास से जैन विश्व भारती में अध्यात्म की अमृत गंगा अनवरत प्रवाहित हो रही है। आज के मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में आचार्यश्री ने ’गुरू दृष्टि के प्रति सजगता’ विषय पर अपना पावन पाथेय प्रदान किया। इस अवसर पर प्रोफेसर आनंद प्रकाश त्रिपाठी ‘रत्नेश’ ने अपनी दो पुस्तकें, ‘स्वर्णिम भारत के स्तंभ: महापुरुषों की अमर गाथा’ और ‘भारत की गौरव: 31 आदर्श भारतीय नारियां’, गुरुदेव के श्रीचरणों में समर्पित कीं। इन पुस्तकों में अन्य महापुरुषों के साथ-साथ आचार्य श्री महाश्रमण जी के जीवन पर भी एक विशेष अध्याय शामिल किया गया है।
मंगल प्रवचन में गुरुदेव ने कहा कि दुनिया में अनेक प्रकार के प्राणी होते हैं। पशु-पक्षियों की भी अपनी वृत्तियां होती हैं। जैन विश्व भारती के परिसर में मयूर जाति के प्राणी कितने अभय होकर परिवार के सदस्यों की तरह रहते हैं कि कोई पास में आ गया तो आ गया, हमारी ओर से भी इनके प्रति अभय रहना चाहिए। उत्तराध्ययन सूत्र में विनीत और अविनीत घोड़ें का दृष्टांत आता है। अविनीत या दुष्ट घोड़ा जो बार-बार चाबुक की इच्छा रखता है, जिसे बार-बार प्रेरणा चाहिए। इसी प्रकार कोई अविनीत होता है जिसे बार-बार कहना पड़ता है। दूसरा विनीत या आकीर्ण घोड़ा होता है जो थोड़ा सा इशारा मिलते ही सही रास्ते पर चलने लगता है। इसी प्रकार ‘विनीत’ शिष्य वह है जिसे एक बार बता दिया जाए तो वह अकरणीय छोड़कर करणीय कार्य में लग जाता है। पारिवारिक जीवन हो या गुरु का सान्निध्य, हमें लापरवाह या उदंड नहीं, बल्कि विनीत कोटि का व्यक्ति बनना चाहिए।
गुरूदेव ने आगे फरमाया कि एक आचार्य के लिए विनीत और सक्षम शिष्य बहुत बड़ा सहारा होते हैं, जिन्हें कोई कार्य सौंप दिया जाए तो वे उसे अपना भाग्य मानकर निष्ठा से पूरा करते हैं। संगठन या संघ में एक अच्छा सिस्टम और तंत्र होता है तो कार्य भी सुगमता से होते है। हमारे धर्म संघ में साध्वियों की संख्या संतों से बहुत ज्यादा है, दोनों की अपनी-अपनी अलग भूमिकाएं हैं, महत्ता हैं। व्यक्ति को केवल विनीत ही नहीं, बल्कि साथ में सक्षम भी होना चाहिए, क्योंकि सक्षमता के बिना विनीत होने पर भी अभीष्ट कार्य पूरा नहीं हो सकता। विनीतता और सक्षमता दोनों हमारे में रहें, तो हमारे जीवन का अच्छा साफल्य हो सकता है।
आचार्य तुलसी अंतरराष्ट्रीय प्रेक्षा ध्यान केंद्र में साध्वियों के 10 दिवसीय प्रेक्षाध्यान शिविर का आज समापन हुआ। जिसमें 85 से अधिक साध्वियां संभागों बनी। शिविर के दौरान प्रशिक्षक साध्वियों, समणियों द्वारा योग, प्राणायाम, कायोत्सर्ग, अनुप्रेक्षा, मंत्र साधना आदि विषयों पर प्रशिक्षण प्रदान किया गया।

