सुरेंद्र मुनोत,ऐसोसिएट एडिटर
Key Line Times
लाडनूं,जैन विश्व भारती में विराजमान शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में आज मुख्य प्रवचन में ‘गुरु के प्रति शिष्य की महानता’ विषय पर मुख्य प्रवचन हुआ। गुरूदेव द्वारा चतुर्विध धर्मसंघ को जहाँ एक ओर धर्म शासन की मर्यादा, गुरु-शिष्य के संबंधों और जीवन में सूक्ष्म प्रबंधन के महत्व पर अत्यंत मार्मिक मार्गदर्शन प्राप्त हुआ, वहीं दूसरी ओर आगामी सन् 2027 के यात्रा पथ की घोषणा ने श्रद्धालुओं को उत्साह से भर दिया। इस दौरान प्रेक्षाध्यान शिविर की संभागी साध्वियों ने गीत के माध्यम से अपने भावों की अभिव्यक्ति दी। प्रश्नोत्तर समाधान का क्रम भी चला। आचार्य तुलसी अंतरराष्ट्रीय प्रेक्षाध्यान केंद्र में आज से संतों के प्रेक्षाध्यान शिविर का शुभारंभ हुआ, जिसके तहत गुरुदेव ने संभागी संतों को प्रेक्षाध्यान की उपसंपदा प्रदान की।
सुधर्मा सभा में धर्म देशना देते हुए गुरुदेव ने कहा – धर्म शासन के संगठन में गुरु और शिष्य दोनों होते हैं, और दोनों की प्रकृति अलग-अलग हो सकती है। सारे गुरु एक समान प्रकृति वाले हों, यह ज़रूरी नहीं है। कोई गुरु अत्यंत शांत स्वभाव के होते हैं, तो कोई थोड़े तेज़ स्वभाव के भी हो सकते हैं। इसी तरह शिष्यों में भी भिन्नता होती है। गुरु के प्रति शिष्य की महानता इसी में है कि वह गुरु के चित्त के अनुरूप (चित्तानुगामी) चले और उनके मन की दृष्टि को समझे। जो शिष्य विनीत, जागरूक और कार्य करने में इतने निपुण होते हैं वह गुरू को कभी असमाधि का मौका ही नहीं देते। अच्छे और विनीत शिष्यों का मिलना भी एक भाग्य की बात है।
तत्पश्चात जीवन में प्रबंधन और निपुणता की महत्ता समझाते हुए गुरुदेव ने फरमाया कि किसी भी कार्य को फूहड़पन से करने के बजाय सूक्ष्म निपुणता और चतुराई से संपन्न करना चाहिए। किताबें व्यवस्थित रखना, कपड़े सही तरीके से समेट कर रखना और सुखाते समय ध्यान रखना कि वायुकाय आदि जीवों की विराधना (हिंसा) न हो, यह सब हमारी कार्यकुशलता है। इसी तरह आहार (भोजन) के समय भी निपुणता होनी चाहिए; जहाँ तक संभव हो भोजन के समय मौन रखना चाहिए और अनावश्यक बोलने या जल्दबाजी करने से बचना चाहिए।
*लाडनूं से दिल्ली का संभावित यात्रा पथ वर्ष 2027*
प्रवचन के अंत में आचार्य श्री ने योगक्षेम वर्ष के पश्चात वर्ष 2027 का संभावित यात्रा पथ घोषित किया। गुरुदेव 24 फरवरी 2027 को लाडनूं, जैन विश्व भारती से प्रस्थान कर सुजानगढ़ पधारेंगे। इसके पश्चात् 25 फरवरी को छापर, 26 को चाड़वास, 27 को बीदासर, 3-4 मार्च को श्री डूंगरगढ़, 8 मार्च को राजलदेसर और 10 मार्च को रतनगढ़ में उनका प्रवास रहेगा। 14 मार्च से 12 अप्रैल तक सरदारशहर में सुदीर्घ प्रवास के उपरांत गुरुदेव 18 अप्रैल को पल्लू, 27 अप्रैल को सूरतगढ़, 30 अप्रैल-1 मई को पीलीबंगा, 8-9 मई को रायसिंह नगर और 14-16 मई को श्री गंगानगर पधारेंगे। आगे का विहार क्रम 11 जून को नोहर, 16 को किराड़ा, 18 को भादरा, 24 को हिसार, 26 को हांसी और 3 जुलाई को रोहतक होते हुए राजधानी की ओर बढ़ेगा। अंततः 8 जुलाई को दिल्ली के पश्चिम विहार और 10 से 12 जुलाई के मध्य अणुव्रत भवन, दिल्ली में गुरुदेव के मंगल प्रवेश का भाव है।

