सुरेंद्र मुनोत,ऐसोसिएट एडिटर
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30.04.2026, गुरुवार, लाडनूं, जैन विश्व भारती पावन परिसर आज विशेष आध्यात्मिक उल्लास का साक्षी बना। युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के योगक्षेम वर्ष प्रवास के अंतर्गत आज का दिन संपूर्ण धर्मसंघ के लिए दोहरे उत्सव का स्वर्णिम अवसर लेकर आया। आज एक ओर जहां शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी का 53वां पावन दीक्षा दिवस ‘युवा दिवस’ के रूप में पूरे हर्षोल्लास व उत्साह के साथ मनाया गया, वहीं दूसरी ओर जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ की नवम साध्वी प्रमुखा विश्रुतविभा जी का 5वां मनोनयन (चयन) दिवस भी श्रद्धा और गरिमा के साथ मनाया गया।
अपने आराध्य के प्रति अगाध गुरुभक्ति का यह क्रम आज प्रभात में ब्रह्म मुहूर्त से ही मंगल अभिनन्दन के साथ प्रारंभ हो गया था। तत्पश्चात, सूर्योदय की प्रथम रश्मियों के साथ साध्वी प्रमुखा विश्रुतविभा जी सहित साध्वी समुदाय विशाल सुधर्मा सभा में गुरु सन्निधि में उपस्थित हुईं। इस अत्यंत भक्तिमय और नयनाभिराम दृश्य के बीच उपस्थित चारित्रआत्माओं द्वारा आचार्य प्रवर एवं साध्वी प्रमुखा जी के श्रीचरणों में भावपूर्ण अभ्यर्थना की गई।
इस मंगल अवसर पर राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष श्री वासुदेव देवनानी ने भी लाडनूं स्थित जैन विश्व भारती पहुंचकर शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन दर्शन किए और इस विशेष दिन पर गुरुदेव का मंगल आशीर्वाद ग्रहण किया। इस गरिमापूर्ण आयोजन से पूरी तपोभूमि एक नई ऊर्जा और उत्साह से गुंजायमान हो उठी। मुख्य प्रवचन में आचार्य प्रवर ने चतुर्दशी के संदर्भ में मर्यादा पत्र का वाचन किया एवं नवदीक्षित साध्वी चंदनप्रभा को आगम वाणी के साथ बड़ी दीक्षा प्रदान की। युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने अपने प्रवचन में साधुत्व की महत्ता बताते हुए कहा कि चारित्र आत्माओं को जो साधुत्व प्राप्त है, वह उनकी सबसे बड़ी संपदा है। दुनिया में किसी सम्राट के पास, किसी के भी पास भारी भौतिक संपदा हो सकती है, लेकिन एक साधु वास्तव में धर्म सम्राट और मन सम्राट होता है, जो धर्म को अपने जीवन में उतार लेता है और मन को पूरी तरह वश में कर लेता है। गुरुदेव ने अपने दीक्षा प्रसंग का स्मरण करते हुए बताया कि 52 वर्ष पूर्व आज ही के दिन वैशाख शुक्ला चतुर्दशी को परमपूज्य आचार्य श्री तुलसी की कृपा व निर्देश से मुनि श्री सुमेरमल जी (लाडनूं) के द्वारा उन्हें यह साधु दीक्षा प्राप्त हुई थी। करोड़ों गृहस्थों में से किसी विरले को ही दीक्षा का यह दुर्लभ अवसर मिलता है। एक साधु भले ही बहुत बड़ा विद्वान, व्याख्यानी या साहित्यकार न भी बन पाए, लेकिन यदि उसका साधुपन अच्छा और निर्मल है, तो उसका आत्म-कल्याण अवश्य सुनिश्चित है।
दैनिक चर्या में अप्रमत्त रहने की प्रेरणा देते हुए आचार्य श्री ने आगे कहा कि साधु को चलते, उठते-बैठते, बोलते और गोचरी करते समय पूर्ण सावधानी रखनी चाहिए ताकि किसी भी रूप में महाव्रतों में कोई दोष न लगे और हिंसा से बचाव होता रहे। हमारे सभी उपकरणों का विधिवत प्रतिलेखन व प्रमार्जन होना चाहिए और इसमें कोई लापरवाही नहीं होनी चाहिए। इसके साथ ही, प्रतिक्रमण और अर्हत वंदना भी बहुत अच्छी तरह, शुद्ध उच्चारण के साथ होनी चाहिए। भाव शून्य होकर की गई क्रिया का उतना फल नहीं मिलता, इसलिए सभी आवश्यक क्रियाएं पूरी भावना और जागरूकता के साथ होनी चाहिए जिससे अच्छी निर्जरा प्राप्त हो सके।
प्रसंगवश गुरुदेव ने आगे फरमाया कि साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी पूर्व में ‘नियोजिका’ व ‘मुख्य नियोजिका’ का सुदीर्घ दायित्व निभाने के कारण अत्यंत परिपक्व हैं और धर्मसंघ को बेहतरीन सेवाएं दे रही हैं। इन्होंने आचार्य महाप्रज्ञ जी के शताब्दी वर्ष पर ‘महाप्रज्ञ वाङ्मय’ के समायोजन का महत्वपूर्ण जिम्मा सफलतापूर्वक निभाया है और आगम कार्यों से भी निरंतर गहराई से जुड़ी हैं। आचार्य प्रवर ने उनके उत्तम स्वास्थ्य, चित्त की निरंतर समाधि और उत्कृष्ट साधना के साथ-साथ धर्म संघ की इसी प्रकार विशिष्ट सेवा करते रहने का मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।
इस अवसर पर साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी ने सारगर्भित उद्बोधन प्रदान किया।
युवा दिवस के संदर्भ में अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के अध्यक्ष श्री पवन मांडोत, महामंत्री सौरभ पटावरी ने श्रद्धाभिव्यक्ति दी। अहमदाबाद परिषद द्वारा संगीतमय प्रस्तुति दी गई। इस मौके पर डॉ. संगीता बैद ने रीड रिफ्लेक्ट एंड राइज नामक पुस्तक का गुरू चरणों में लोकार्पण किया।

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