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सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
Key Line Times
सुरेन्द्रनगर (गुजरात) ,जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी शनिवार से गुजरात के सौराष्ट्र की धरा गतिमान हुए तो गुजरात का यह क्षेत्र भी मानों धन्य हो गया। आज से लगभग 57 वर्ष इस धरा को तेरापंथ के नवमे अधिशास्ता आचार्यश्री तुलसी ने पावन किया था, उसके बाद इतने लम्बे वर्षों के बाद एकादशमाधिशास्ता आचार्यश्री का शुभागमन इस क्षेत्र में रहने वाले श्रद्धालुओं को उत्साहित करने वाला था। शनिवार को प्रातः आचार्यश्री ने टोकरला से मंगल प्रस्थान किया और सौराष्ट्र की धरा पर लगभग 15 कि.मी. का प्रलम्ब विहार कर लीमड़ी में स्थित नीलकंठ विद्यालय में पधारे। जहां विद्यालय से जुड़े लोगों व विद्यार्थियों ने शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी का भावपूर्ण स्वागत-अभिनंदन किया। युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित जनता को अपनी अमृतवाणी से पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि भौतिकता तो वैसे जीवन के बहुत काम आता ही है। हमारे खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने, रहने के लिए, आवागमन आदि-आदि चीजें तो पुद्गल ही होती हैं, लेकिन कुछ-कुछ पुद्गल आध्यात्मिकता में भी सहायक बनते हैं। अपनी आत्मा के कल्याण के लिए, आगे का मार्ग प्रशस्त करने के लिए आदमी को त्याग करने का प्रयास करे तो वह त्याग अपने आप में धर्म हो जाता है। मजबूरीवश यदि कोई किसी पदार्थ का उपभोग नहीं कर पा रहा है तो वह उसके लिए त्याग नहीं होता है। जो आदमी वस्त्र, मकान, गंध आदि-आदि पदार्थ परवशता के कारण भोग नहीं सकता, क्रय करने की क्षमता नहीं है तो वह उसकी मजबूरी है, उसे त्यागी नहीं कहा जा सकता है। शास्त्र में त्यागी उसे कहा गया है कि जिसके पास भौतिक पदार्थों की उपलब्धता होते हुए भी वह स्ववशता में पदार्थों का परित्याग कर देता है, वह त्यागी होता है। भगवान अरिष्टनेमी ने भौतिक सुखों का परित्याग किया था। वह विरक्ति की भावना त्याग है। मजबूरी में भोग नहीं करना त्याग नहीं, बल्कि स्ववशता में पदार्थों के उपभोग को त्याग देने वाला त्यागी होता है। साधु तो त्यागी होते हैं। साधु अपनी आत्मा के कल्याण के लिए कितना-कितना त्याग करते हैं। जहां त्याग होता है, वहां सुख का निवास भी होता है। संस्कृत के एक सूक्त में बताया गया है कि राग के समान दुःख नहीं है और त्याग के समान सुख नहीं है। राग है तो दुःख हो सकेगा और त्याग की भावना है तो वहां दुःख आ ही नहीं सकता, इसलिए वहां सुख व्याप्त हो सकता है। किसी विषय, वस्तु, आदि के प्रति अनावश्यक राग, लालसा हो जाए और आदमी को उसे वह प्राप्त न हो पाए तो वह आदमी दुःखी बन सकता है। राग तो हो गया, किन्तु उसके लिए उसमें अर्हता नहीं है, योग्यता नहीं है तो वह राग की भावना तो आदमी को दुःखी बनाने वाली ही होगी। आचार्यश्री ने समुपस्थित विद्यार्थियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि यदि बच्चे को मोबाइल फोन से ज्यादा राग हो जाए और उसके हाथ से मोबाइल फोन ले ले तो बच्चे के मन में कितना दुःख हो जाता है, कोई-कोई तो रोने-चिल्लाने लग सकता है। अर्थात् उसके मन में उस पदार्थ अथवा मोबाइल के प्रति कितना राग हो जाता है। इसलिए कहा गया है कि राग के समान कोई दुःख नहीं होता। आदमी को अपने जीवन में त्याग की भावना को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने सौराष्ट्र में अपने आगमन के संदर्भ में कहा कि गुरुदेव तुलसी अपनी यात्रा के दौरान इस सौराष्ट्र क्षेत्र व लीमड़ी सन् 1967 में पधारे और अब मेरा आना सन् 2024 में आना हुआ है। लगभग 57 वर्ष का अंतराल हो गया। इस सौराष्ट्र की धरा पर आने का अवसर मिला है। सौराष्ट्र की धरा पर भी त्याग की चेतना बनी रहे। नीलकंठ विद्यालय परिवार की ओर से श्री लालाभाई पटेल ने आचार्यश्री के स्वागत में अपनी भावाभिव्यक्ति दी। सौराष्ट्र तेरापंथी सभा के मंत्री श्री मदन गंगावत ने भी अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी।

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