सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
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13.05.2026, बुधवार, लाडनूं ,जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, महातपस्वी, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बुधवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘तप की महिमा’ के संदर्भ में पावन संबोध प्रदान करते हुए कहा कि इस दुनिया में अनेक संदर्भों में आदमी का महिमा मण्डन हो सकता है। कोई आदमी अपनी साधना और तपस्या से महिमाशाली बनता है। कोई अपने वक्तृत्व से प्रशंसा का पात्र बनता है तो कोई अन्य कोई करतब दिखाने से भी लोगों से प्रशंसा प्राप्त करता है। कोई साहित्य के क्षेत्र में प्रशंसा प्राप्त कर सकता है।
आगमकार ने बताया है कि सामान्य जाति व सामान्य कुल में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी तपोधन बन सकता है। सामाजिक परिवेश में देखें तो एक सामान्य जाति का आदमी भी देश के सर्वोच्च पद को प्राप्त कर सकता है। यहां धर्म और जाति का भी वर्णन है। यहां तप की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि एक तपस्वी साधु यदि मैले कपड़े में हो और अथवा हीन जाति का हो, किन्तु तपस्या इतनी विशेष हो जाए, साधना इतनी उच्च हो जाए कि वह कोई सिद्धि प्राप्त हो जाए। इसलिए मैले कपड़े में भी कोई असाधारण व्यक्तित्व मिल सकता है तो कोई सफेद कपड़े में भी सामान्य अथवा उससे भिन्न व्यक्तित्व भी मिल सकता है। कपड़े आदि तो बाहर की चीजें हैं।
शरीर को देखकर भी अंकन हो सकता है, किन्तु सामान्य शरीर, सामान्य पोषाक और सामान्य जाति का आदमी भी महान व्यक्ति हो सकता है। वह उसकी तपस्या, साधना का बल होता है। आदमी में तपस्या कितना, ज्ञान कितना और सद्गुण कितने हैं, इसका विशेष स्थान होना चाहिए। उच्च स्थान पर बैठने अथवा नहीं बैठना भी एक शिष्टाचार या प्रोटोकॉल की बात हो सकती है। जो जिसके लायक है, उस अनुरूप ही उसका उपयोग होता रहे तो अच्छा हो सकता है।
अनुकूलता और प्रतिकूलता की स्थितियां भी जीवन में आती हैं। अनुकूल और प्रतिकूल दोनों ही परिस्थितियों में आदमी धैर्य का परिचय देते हुए आदमी को शांति में रहने का प्रयास करना चाहिए। अपने भीतर समता भाव को रखने का प्रयास करना चाहिए। कोई भी आदमी यदि तपस्या करता है, साधना करता है तो वह महत्ता को प्राप्त कर सकता है। यह तपस्या की महिमा होती है। हम सभी की आत्मा तप और संयम से भावित रहे, यह काम्य है।
आचार्यश्री के जन्मोत्सव/पट्टोत्सव के संदर्भ में चारित्रात्माओं की प्रस्तुति का क्रम भी अभी बना हुआ है। आज मुनि अजितकुमारजी, मुनि देवेन्द्रकुमारजी, मुनि मृदुकुमारजी, मुनि वर्धमानकुमारजी व मुनि धैर्यकुमारजी ने संयुक्त रूप मंे संवादात्मक प्रस्तुति दी। मुनि देवार्यकुमारजी, साध्वी परमार्थप्रभाजी, साध्वी करुणप्रभाजी, साध्वी नन्दिताश्रीजी ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। श्री अमित सिंघी ने आचार्यश्री की अभ्यर्थना में गीत का संगान किया।

