सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
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06.05.2026, बुधवार, लाडनूं ,करीब 37 वर्षों बाद जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी, अखण्ड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में योगक्षेम वर्ष का आयोजन लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती परिसर में हो रहा है। इससे पहले योगक्षेम वर्ष तेरापंथ धर्मसंघ के नवमाधिशास्ता आचार्यश्री तुलसी की पावन सन्निधि में इसी जैन विश्व भारती परिसर में आयोज्य हुआ था। इस कारण जैन विश्व भारती संस्थान का मानों सौभाग्य है कि तेरापंथ धर्मसंघ के दोनों योगक्षेम वर्ष के आयोजन का सौभाग्य जैन विश्व भारती परिसर को ही प्राप्त हुआ है।
योगक्षेम वर्ष के कारण तेरापंथ की राजधानी लाडनूं का भी मानों सौभाग्य जागृत हो गया है। आचार्यश्री के एक वर्ष के प्रवास के कारण कितने ही बंद घर अपने आराध्य की सेवा, उपासना के लिए खुल गए हैं। इस कारण न केवल जैन विश्व भारती परिसर, अपितु पूरे लाडनूं नगर में इस समय मेले जैसा माहौल दिखाई दे रहा है। नित्य की भांति बुधवार को सुधर्मा सभा में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में सर्वप्रथम साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया। आचार्यश्री ने चतुर्विध धर्मसंघ को थोड़ी देर तक ध्यान का प्रयोग कराया।
तत्पश्चात शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने सुधर्मा सभा में बड़ी संख्या में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘किनारे पर क्यों खड़े हो?’ को विवेचित करते हुए कहा कि भगवान महावीर मानों गौतम को समझा रहे हैं कि देखो गौतम तुमने समुद्र को पार किया है, अब किनारे पर क्यों खड़े हो? एकदम पार पहुंचने के लिए पराक्रम करो और क्षण मात्र भी प्रमाद मत करो। यहां समुद्र जन्म-मरण वाला भवसागर है। जहां बार-बार जन्म और मृत्यु होता रहता है। कर्म को भी एक प्रकार का अर्णव कहा गया है। इसी अर्णव को पार करने के लिए भगवान महावीर गौतम स्वामी को प्रेरणा दे रहे हैं कि तुमने पूरा अर्णव पार कर लिया है, अब किनारे पर क्यों खड़े हो? जल्दी करो और इसे पूरा करो, वह बिना क्षण भर प्रमाद किए हुए।
हम सभी चारित्रात्माएं अपने जीवन को देखें और प्रयास करें कि जन्म-मरण रूपी भवसागर और कर्म रूपी भवसागर से कितना शीघ्र पार हुआ जा सकता है। जितना संभव हो सके, प्रमाद से बचते हुए अधिक से अधिक समय साधना में लगाने का प्रयास करना चाहिए। चारित्रात्माओं को अपने जीवन में जागरूकता रखने का प्रयास करना चाहिए। साधु के जीवन में कभी भी संन्यास को छोड़ने की भावना न आए। संयम रूपी रत्न का पूर्ण जागरूकतापूर्वक सुरक्षा करने का प्रयास होना चाहिए। शरीर छूटे तो छूटे, लेकिन यह धर्म शासन न छूटे।
साधु को जहां तक संभव हो सके, संयम की सुरक्षा करने का प्रयास होना चाहिए। कभी ऐसी स्थिति आए कि या तो प्राण बचेगा या संयम बचेगा, ऐसे समय में भी चारित्रात्मा का विचार होना चाहिए कि चलो प्राण जाए तो जाए, लेकिन संयम न जाए। साधुपन को पूर्ण जागरूकता के साथ पालन करने का प्रयास करना चाहिए। साधुपन को पुष्ट बनाने से संदर्भित गीतों का आंशिक संगान किया। आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान किए।
कार्यक्रम के दौरान वैरागण जिनाज्ञा ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी तो आचार्यश्री ने महति कृपा करते हुए जिनाज्ञा को मुमुक्षु रूप में साधना करने की स्वीकृति प्रदान की।
योगक्षेम वर्ष में गुरु सन्निधि में उपस्थित चारित्रात्माओं द्वारा आचार्यश्री के जन्मोत्सव व पट्टोत्सव के संदर्भ में प्रस्तुति के क्रम में मुनि धैर्यकुमारजी, साध्वी कुसुमप्रभाजी, साध्वी ज्योतियशाजी, साध्वी महकप्रभाजी व साध्वी दक्षप्रभाजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी।

