
सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
Key Line Times
05.05.2026, मंगलवार, लाडनूं ,जैन विश्व भारती, लाडनूं के सुरम्य परिसर में योगक्षेम वर्ष के लिए जैन श्वेताम्बर तेरापंथ के एकादशमाधिशास्ता, मानवता के मसीहा, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी विशाल धवलसेना के साथ विराजमान हैं। गत दिनों से मौसम ने करवट ली है। देश के कई राज्यों में तेज आंधी, तूफान के साथ-साथ हुई बरसात ने लोगों को गर्मी से राहत तो दिलाई है, किन्तु आंधी-तूफान जन-जीवन को काफी प्रभावित भी किया है। हालांकि आंधी और बरसात के बाद जैन विश्व भारती परिसर की हरियाली मानों और अधिक बढ़ गई है।
मंगलवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को मंगल प्रवचन से पूर्व युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने कुछ समय तक ध्यान का प्रयोग कराया। उससे पूर्व साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया। तत्पश्चात महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित श्रद्धालुओं व चारित्रात्माओं आदि को आज के निर्धारित विषय ‘इन्द्रिय बलहीनता पर दें ध्यान’ को व्याख्यायित करते हुए कहा कि मानव शरीर में पांच इन्द्रियां होती हैं। संसार में कई प्राणी ऐसे होते हैं, किसी में एक इन्द्रिय, किसी में दो, किसी में तीन, किसी में चार तो किसी में पांच भी होते हैं। कई मनुष्य अनिन्द्रिय संज्ञा वाले भी होते हैं। पंचेन्द्रिय प्राणी होने के लिए एक विशेष कसौटी होती है कि जिस प्राणी के श्रवेणेन्द्रिय होती है, वह पंचेन्द्रिय प्राणी ही होता है। सुनने की क्षमता होती है तो वह पंचेन्द्रिय प्राणी ही होते हैं। मनुष्य पंचेन्द्रिय प्राणी है। इन्द्रियां विकास की भी मानों द्योतक हैं। इन्द्रियों का क्रम भी विकास को मूल में देखा जा सकता है।
जीवन में देखा जाए तो इन्द्रियों की जो शक्तिहीनता आती है, वह मानों सबसे पहले आंख पर आती है। कमजोरी का पहला असर आंखों पर बहुलतया आती है। आदमी को इन्द्रिय की बलहीनता पर ध्यान देने का प्रयास करना चाहिए। इन्द्रियों का बल कमजोर होता है तो कभी मनोबल भी कमजोर होता है तो उसके साथ-साथ मानसिक और शारीरिक कमजोरी भी देखी जाती है। आदमी के प्राणशक्ति में दुर्बलता भी देखी जा सकती है। आदमी अधिक उम्र वाला हो जाता है तो उसका मनोबल भी कमजोर हो जाता है। आदमी जवानी में जितना मेहनत, जितना बल, जितना कार्य करने की सक्षमता होती है, वह बुढ़ापे में कमी दिखाई देने लगती है। मनोबल ही नहीं, कायबल भी मानों धीरे-धीरे क्षीण होती जाती है। आचार्यश्री महाप्रज्ञजी अपने अंतिम दिन भी प्रवचन किए थे। इसलिए आदमी को अपनी इन्द्रियों की बलहीनता पर ध्यान देने का प्रयास करना चाहिए।
इन्द्रियों की सक्षमता होती है, शरीर का बल अच्छा होता है तो कार्य करने की सक्षमता भी मानों बढ़ जाती है। इससे आदमी अधिक कार्य भी सकता है। इसलिए इन्द्रियों की सक्षमता पर ध्यान देने का प्रयास होना चाहिए। रात में जितना आवश्यक हो, उसे करना तो अच्छी बात है, लेकिन रात्रि में अधिक से अधिक कंठस्थ ज्ञान को चिताड़ने का प्रयास होना चाहिए। रात में ज्यादा जप और ध्यान भी किया जा सकता है। धर्म के कार्यों को अधिक समय तक और अच्छे ढंग से करने के लिए इन्द्रियों की सुरक्षा का ध्यान रखने का प्रयास हो। इन्द्रियों का सदुपयोग करने का प्रयास हो।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को उत्तरित किया। गुरु सन्निधि में बड़ी संख्या मंे साधु-साध्वियों की उपस्थिति के कारण मानों आचार्यश्री के जन्मोत्सव व पट्टोत्सव कई दिनों तक मनाने का क्रम बन रहा है। अपने आराध्य के प्रति अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति का क्रम चारित्रात्माओं द्वारा निरंतर जारी है। आज इस क्रम में मुनि पारसकुमारजी, साध्वी संवेगप्रभाजी, साध्वी रुचिरप्रभाजी, साध्वी कुसुमप्रभाजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी।
राष्ट्रीय सेवा योजना के राज्य सम्पर्क अधिकारी डॉ. नरेन्द्र गुप्ता ने आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में उपस्थित होकर अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति देते हुए आचार्यश्री से मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया।

