सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
Key Line Times
लाडनूं, डीडवाना-कुचामन (राजस्थान) ,जन-जन के मानस को आध्यात्मिक ऊर्जा का अभिसिंचन प्रदान करने वाले, जन-जन के मानस में सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की ज्योति जलाने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी जैन विश्व भारती परिसर में विराजमान हो चुके हैं। आचार्यश्री ने इस परिसर में प्रवेश के साथ ही एक दीक्षा समारोह का आयोजन करने के साथ-साथ त्रिदिवसीय अनुष्ठान के उपरान्त योगक्षेम वर्ष की कालावधि को प्रारम्भ करने की घोषणा भी कर दी है। अब वर्तमान समय में चतुर्विध धर्मसंघ इस योगक्षेम वर्ष का अपने जीवन में आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने को उत्सुक नजर आ रहा है। प्रतिदिन सुधर्मा सभा में उपस्थित होकर श्रद्धालु जनता ही नहीं, योगक्षेम वर्ष के लिए गुरुकुलवास में पहुंचे सैंकड़ों की संख्या में साधु-साध्वियां, समणियां भी उपस्थित होकर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं।
रविवार को सुधर्मा सभा में युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ मुख्य प्रवचन कार्यक्रम का शुभारम्भ किया। साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया। तदुपरान्त युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि आगमों मोक्ष, निरवाण व मुक्ति की बात आती है। जीवन का परम लक्ष्य मोक्ष होना चाहिए। मोक्ष मार्ग को ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप- इन चार अंगों वाला बताया गया है। ज्ञान से जीव भावों व पदार्थों को जानता है, दर्शन से श्रद्धा करता है, चारित्र से कर्म मार्ग को निरुद्ध करता है और तप से आत्मा का परिशोधन करता है। ज्ञान अपने आप में परम पवित्र तत्त्व है। ज्ञान अपने आप में शुद्ध लब्धि है। दुनिया में अपार ज्ञान है। जिनके अर्जन में कई जीवन भी लगें तो शायद कम ही हो। अब आदमी को समस्या हो सकती है। ज्ञान का विकास कैसे करे तो शास्त्र में एक समाधान दिया गया है कि जो सारभूत हो और जो अपने लिए उपयोगी हो, वैसे ज्ञान को ग्रहण करना चाहिए। पुस्तकें ज्ञान का अहम माध्यम हैं। आगमों का सम्मान रखने का प्रयास होना चाहिए। आगम को पढ़ें तो उन्हें अच्छे स्थान रखने का प्रयास करना चाहिए। सभी को ज्ञान की आराधना में अपने समय को नियोजित करने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री ने जिज्ञासा का अवसर प्रदान किया तो अनेक साधु-साध्वियां, व समणजी आदि ने अपनी-अपनी जिज्ञासाओं को आचार्यश्री के समक्ष प्रस्तुत किया। आचार्यश्री ने उन समस्त जिज्ञासाओं को समाहित किया। यह दृश्य उपस्थित श्रद्धालुओं व चारित्रात्माओं के लिए ज्ञानवर्धक तो रहा ही, इसके साथ ही यह दृश्य वास्तव में एक गुरुकुल-सा दृश्य उत्पन्न कर रहा था, लेकिन शिष्य-शिष्याएं अपने गुरु से साक्षात् अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त करते हैं। यह दृश्य उपस्थित श्रद्धालु जनता को अतिशय भावविभोर बनाने वाला तथा ज्ञानात्मक वृद्धि कराने वाला भी रहा।

