
सुरेंंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
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अजमेर (राजस्थान) ,आध्यात्मिक नगरी अजमेर को आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत बनाकर गुरुवार को प्रातःकाल की मंगल बेला में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अजमेर से मंगल प्रस्थान किया। अजमेर के एकदिवसीय प्रवास के दौरान कई गणमान्य महानुभावों के साथ मालासेरी डूंगरी के पुजारी श्री हेमराज पोसवाल ने भी आचार्यश्री से मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। अजमेरवासियों पर मंगल आशीषवृष्टि करते हुए आचार्यश्री अगले गंतव्य की ओर बढ़ चले।
आचार्यश्री लगभग तेरह किलोमीटर का विहार सम्पन्न कर गगवाना में स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में पधारे। विद्यालय परिसर में आयोजित प्रातःकालीन मंगल प्रवचन में उपस्थित जनता को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि आगम में चार प्रकार की समाधि बताई गई है-विनय समाधि, श्रुत समाधि, तपः समाधि और आचार समाधि। आदमी के मन में शांति की कामना रहती है कि उसका जीवन शांतिमय रहे। उसे किसी प्रकार की तकलीफ न आए। कभी कोई मानसिक उलझने न आएं। रोटी-पानी की चिंता, कपड़ा, मकान, दुकान, गहने, आभूषण आदि-आदि अनेक भौतिक पदार्थों व चीजों के लिए चिंता हो सकती है। किसी प्रकार की समस्या तो हो सकती है, किन्तु आदमी को दुःखी बनने से बचने का प्रयास करना चाहिए। समस्या के समाधान का प्रयास करना चाहिए।
जीवन में शांति और समाधि के लिए एक उपाय बताया गया कि आदमी को जीवन में विनयशीलता के विकास प्रयास करना चाहिए। दूसरी बात बताई गई कि आदमी को शांति-समाधि की प्राप्ति के लिए श्रुत की आराधना करने का प्रयास करना चाहिए। स्वाध्याय, अध्ययन से ज्ञान की प्राप्ति होती है और उससे आदमी का चिंतन प्रशस्त बन जाता है।
शांति की प्राप्ति के लिए आदमी को तपस्या भी करने का प्रयास करना चाहिए। तपस्या करने से भी समाधि की प्राप्ति हो सकती है। कोई-कोई बीमारी तपस्या से ठीक हो सकती है। तपस्या में मन लग जाने से आध्यात्मिक और मानसिक समाधि भी प्राप्त हो सकती है। चौथा उपाय बताया गया कि आदमी को अपने आचार को अच्छा बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। आदमी में सदाचार हो तो उसे शांति-समाधि की प्राप्ति हो सकती है। जीवन में विनय, श्रुत, तपस्या व आचार रहे तो जीवन शांतिमय बन सकता है।
गगवाना के समाजसेवी श्री बिलाल खान, सरपंच श्रीमती गुलजान खानम, विद्यालय की प्रधानाचार्य श्रीमती वन्दना वालिया ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी।

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