surendra Munot Associate Editor all india
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20.07.2026, सोमवार, लाडनूं ,करीब 37 वर्षों बाद तेरापंथ की राजधानी के रूप में सुविख्यात लाडनूं की भूमि पर बने भव्य एवं रमणीय जैन विश्व भारती परिसर में तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी विशाल धवल सेना संग योगक्षेम वर्ष का मंगल प्रवास कर रहे हैं। इसके साथ ही इस वर्ष में आने वाले सभी संघीय कार्यक्रमों का आयोजन भी इसी परिसर में हो रहा है। लगभग तेरह महीनों तक का प्रवास प्राप्त कर लाडनूं निवासी अपने सौभाग्य पर इतरा उठे हैं। तेरापंथ के इतिहास में अब तक दो ही योगक्षेम वर्ष के प्रवास हुए हैं और दोनों ही इसी धरा पर आयोजित हुए हैं। यह सुअवसर लाडनूंवासियों के लिए नहीं, अपितु पूरे देश भर के श्रद्धालुओं के लिए विशेष अवसर बना हुआ है। जहां एक ही स्थान पर पहुंच जाने से आचार्यश्री सहित करीब चार सौ से अधिक चारित्रात्माओं के दर्शन-सेवा का सुअवसर प्राप्त हो जा रहा है। नित्य प्रति गुरुमुख से प्रसारित होने वाली ज्ञानगंगा में श्रद्धालु डुबकी लगाकर अपना जीवन धन्य बना रहे हैं। इतना ही नहीं, गुरुकुलवास में उपस्थित समस्त चारित्रात्माएं, समणीवृंद, मुमुक्षुवृंद आदि भी इस सुअवसर का पूर्ण लाभ प्राप्त कर रहे हैं। सोमवार को भव्य एवं विशाल सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘शाश्वत वास का स्थान’ को वर्णित कर पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि इस संसार में दो प्रकार के दुःख होते हैं- शारीरिक दुःख और मानसिक दुःख। मनुष्य, पशु अथवा स्थावर या विकलेन्द्रिय जीवों को शारीरिक कष्ट होते हैं। कितने-कितने मरीज विभिन्न अस्पतालों में भर्ती हुए दिखाई देते हैं। कितनी-कितनी बीमारियां देखने, सुनने व जानने को मिलती हैं। दुनिया में मानसिक दुःख भी होते हैं। शरीर में कोई दुःख न होते हुए भी आदमी मन से दुःखी होता है। किसी को पद से हटा दिया जाए, किसी प्रिय आदमी का वियोग हो जाए तो भी मानसिक दुःख हो सकता है। आदमी कभी अवसाद में भी चला जाता है। शरीर और मन दोनों में अशांति हो जाए तो कठिनाई की बात हो सकती है। मन में समाधि, शांति रहे तो अच्छा हो सकता है। प्रश्न हो सकता है कि ऐसा कौन ऐसा स्थान हो क्षेम, शिव हो और अनाबाद हो?
उत्तर दिया गया कि एक ऐसा धु्रव स्थान है, जो लोक के अग्र भाग में है, जहां जाना कठिन है, लेकिन वह स्थान ऐसा है, जहां बुढ़ापा, नहीं, शारीरिक कष्ट नहीं, मृत्यु भी नहीं, कोई वेदना-पीड़ा नहीं है, वह स्थान है- मोक्ष। साधु साधना करने के बाद उस स्थान को प्राप्त कर लेते हैं। वह स्थान शाश्वत वास है। वहां जाने के बाद वापस नहीं आना होता। मोक्ष का स्थान शाश्वत वास का स्थान है। मोक्ष के जीवों के लिए मोक्ष का स्थान शाश्वत स्थान है। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासा के उत्तर प्रदान किए। मंगलपाठ के उपरान्त पूज्य सन्निधि में उपस्थित गुवाहाटी ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति दी। तेरापंथी सभा गुवाहाटी के अध्यख श्री रितेश खटेड़ ने अपनी अभिव्यक्ति दी। ज्ञानशाला की प्रशिक्षिकाओं ने भी गीत का संगान किया। आचार्यश्री ने ज्ञानार्थियों को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।

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