सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
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लाडनूं, डीडवाना-कुचामण (राजस्थान),गुरुवार को डीडवाना-कुचामन जिले में स्थित लाडनूं नगर, जिसे तेरापंथ धर्मसंघ की राजधानी होने का भी गौरव प्राप्त है। ऐसी तेरापंथ की राजधानी लाडनूं में गुरुवार को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी का मंगल पदार्पण हुआ तो अपने अनुशास्ता के चरणों का स्पर्श पाकर लाडनूं नगरी आलोकित हो उठी। श्रद्धालुओं की विशाल उपस्थिति व उनके द्वारा उच्चरित जयघोषों से पूरी नगरी महाश्रमणमय बन गई। हर वर्ग, समुदाय, समाज के लोग जगह जगह समूहबद्ध रूप में खड़े हो धवल सेना की आगवानी कर रहे थे। जन मानस की भावनाओं को पूर्ण करते, उमड़े जन समूह को अपने दोनों करकमलों से मंगल आशीष प्रदान करते, कितने ही घरों, प्रतिष्ठानों, मुख्य स्थानों के समक्ष मंगलपाठ सुनाते आचार्यश्री लाडनूं नगर के भीतर गतिमान थे। इस कारण लगभग डेढ़ किलोमीटर का विहार पूर्ण करने भी आचार्यश्री को कई घंटे लगे। विहार के दौरान आचार्यश्री लाडनूं के राम आनंद गौशाला में पधारे और वहां उपस्थित जनता को पावन पाथेय प्रदान करते हुए मंगलपाठ सुनाया। वहां से सैंकड़ों की संख्या में लाडनूं की महिलाएं अपने सर पर कलश लेकर आचार्यश्री के अभिनंदन में उपस्थित थीं। वे जुलूस में सम्मिलित हुईं। मार्ग में घोड़ावत हॉस्पिटल, गवर्मेंट हॉस्पिटल गुरू चरणों से पावन बने। आचार्यश्री एक दिवसीय प्रवास हेतु श्री भागचंद बरड़िया के निवास स्थान भाग्यश्री में पधारे। गुरुदेव के प्रवास का सौभाग्य प्राप्त कर बरड़िया परिवार हर्षविभोर नजर आ रहा था। इस अवसर पर उपस्थित श्रद्धालु जनता को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन संबोध प्रदान करते हुए कहा कि धर्म एक ऐसा तत्त्व है, जो परम मंगल होता है। धर्म का एक अर्थ आत्मशुद्धि का साधन। जिस उपाय से आत्मा निर्मलता और उज्जवलता को प्राप्त हो, वह धर्म होता है। कर्त्तव्य को भी धर्म के रूप में देखा जा सकता है। अध्यात्म के संदर्भ में आत्मा की शुद्धि का जो साधन है, वह धर्म होता है।आदमी को अपनी ओर से किसी के प्रति भी दुर्भावना नहीं रखना। विश्वास करना अपने विवेक की बात होती है। जिससे चेतना व आत्मा शुद्ध बने, वह धर्म है। सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की बातें हम यदा-कदा गांवों, नगरों व शहरों में बताया करते हैं। इनके संकल्प भी लोगों को कराया करते हैं। सद्भावना से भी आत्मा निर्मल बन सकती है। सभी प्राणियों के प्रति सद्भावना हो, उसके कल्याण की भावना हो तो आत्मा निर्मल हो सकती है। उसी प्रकार नैतिकता भी जीवन में हो तो मानना चाहिए कि आत्मा की निर्मलता का एक आयाम प्राप्त हो गया। ईमानदारी के लिए आदमी झूठ, कपट और चोरी से बचे। इन तीनों से आदमी बचता रहे तो मानना चाहिए कि उसके जीवन में ईमानदारी व नैतिकता का निवास हो रहा है। ईमानदारी ऐसी चीज है, जो सभी के लिए कल्याणकारी है। आदमी कोई भी काम करे, उसमें उसे ईमानदारी रखने का प्रयास करे। आचार्यश्री तुलसी ने अणुव्रत चलाया। आदमी जहां भी जाए, अणुव्रत को साथ रखने का प्रयास करना चाहिए। ईमानदारी का संकल्प आदमी के जीवन में रहना चाहिए। कोई भी क्षेत्र हो, ईमानदारी रखने का प्रयास होना चाहिए। ईमानदारी को सर्वोत्तम नीति कहा गया है। आदमी के जीवन में अहिंसा-मैत्री की भावना रखने का प्रयास होना चाहिए। सभी प्राणियों के प्रति मैत्री की भावना होनी चाहिए। आदमी के जीवन में संयम रहे। जीवन में सादगी और विचारों में उच्चता रहे तो जीवन अच्छा हो सकता है। आचार्यश्री ने कहा कि आज हमारा लाडनूं में आना हुआ है। परम पूज्य गुरुदेव तुलसी की जन्मस्थली, दीक्षास्थली, उनके लम्बे प्रवास की भूमि, सप्तम आचार्य डालगणी के प्रयाण की भूमि पर आज हमारा आना हुआ है। कल जैन विश्व भारती में प्रवेश होना है। बरड़ियाजी के यहां आना हो गया। यहां की जनता में खूब अच्छी भावना बनी रहे। कार्यक्रम में बालिका पृशा बालड़ ने अपनी बालसुलभ प्रस्तुति दी। बरड़िया परिवार ने गीत का संगान किया।

