surendra Munot Associate Editor all india
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लाडनूं ,जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बुधवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के दौरान अपने पावन प्रवचन में आज के निर्धारित विषय ‘मार्दव से क्या मिलेगा?’ को आगम के माध्यम से विश्लेषित करते हुए कहा कि आगम में प्रश्न किया गया कि मार्दव से जीव क्या प्राप्त करता है? जिस प्रकार ऋजु से आर्जव शब्द बना, उसी प्रकार मृदु से भाववाचक संज्ञा के रूप में मार्दव बनता है। अहंकार शून्यता से जीव क्या प्राप्त करता है? मान का विपक्षी शब्द है मार्दव। अहंकार विनय का नाश करने वाला होता है। मान को जीतने के लिए मार्दव का उपयोग किया जा सकता है। मृदुता की भावना अहंकार का नाश करने वाली होती है।
आदमी के जीवन में अनेक सद्गुण देखे जा सकते हैं। उनमें से एक सद्गुण होता है, मार्दव अर्थात् मृदुता विनयशीलता। अविनीत आदमी दुःखी बनता है और सुविनीत को सुखी बनता है। अविनीत को विपत्ति और सुविनीत को सम्पत्ति प्राप्त होती है। चाहे वह समाज हो, राजनीति हो, घर-परिवार हो, अविनीत को दुःख और विपत्ति ही प्राप्त होती है और जो सुविनीत होता है वह सुख और सम्पत्ति को प्राप्त कर सकता है। यह प्रायः सभी जीवों में हो सकता है। साधु संस्था हो या सामाजिक संस्था हो, सभी जगह सुविनीत को स्थान मिलता है। अविनीत को प्रत्येक जगह तिरस्कार झेलना हो सकता है। जिसमें नमन की भावना है, जिसमें क्षमाशीलता है और जिसमें अपने आराध्य की भक्ति है, वह बड़ आदमी होता है। जिसमें सबके प्रति आदर का भाव होता है, वह बड़ा आदमी होता है।
जिसका स्वभाव अच्छा होता है, ऊंचा होता है, वह आदमी बड़ा होता है, महान होता है। कोई आकृति से नीच अथवा महान नहीं होता, आदमी अपने प्रकृति से नीच और प्रकृति से महान बनता है। आदमी को व्यवहार कुशल बनने का प्रयास करना चाहिए। जितना महत्त्व पढाई-लिखाई होता है, उससे अधिक महत्त्व व्यवहार कुशलता का होता है। कहा भी जाता है कि विद्या विनय से ही सुशोभित होती है। ज्ञान होने पर भी मौन रख लेना, शक्ति होने पर क्षमा कर देना, दान देकर भी श्लाघा की अपेक्षा नहीं रखना, यह बड़प्पन की बात होती है। जीवन में सुखी बनने का एक उपाय मार्दव है। साधु-साध्वियों में विनयशीलता का, मृदुता का विकास होना चाहिए।
कार्यक्रम के दौरान आचार्यश्री महाप्रज्ञजी की कृति भीतर की ओर का अंग्रेजी अनुवाद और साध्वी राजीमतीजी द्वारा लिखित पुस्तक भावना- पथ पुस्तक जैन विश्व भारती द्वारा आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित किया गया। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में पावन पाथेय प्रदान किया।

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