surendra Munot Associate Editor all india
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लाडनूं ,जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी जैन विश्व भारती परिसर में योगक्षेम वर्ष का महामंगल प्रवास कर रहे हैं। आचार्यश्री के साथ करीब 450 से अधिक चारित्रात्माएं भी तेरापंथ की राजधानी में प्रवासित हैं। अपने सुगुरु के साथ इतने चारित्रात्माओं की उपस्थिति ने लाडनूं की धरा को आध्यात्मिकता के रंग में रंग दिया है। चारों ओर धर्म और अध्यात्म की गूंज सुनाई दे रही है। सूर्योदय से सूर्यास्त के उपरान्त तक यहां लोग अपने जीवन को आध्यात्मिकता से भावित बना रहे हैं। दर्शन, सेवा, उपासना, शिक्षण-प्रशिक्षण, ज्ञानार्जन, चिंतन-मंथन, गोष्ठी, कार्यशाला, शिविर, सेमिनार आदि-आदि कितने-कितने आयामों के माध्यम से लोग अपने जीवन को सार्थक बनाने में जुटे हुए हैं। देश-विदेश से श्रद्धालुओं के भी निरंतर पहुंचने का क्रम जारी है। आचार्यश्री का प्रातःकालीन मंगल प्रवचन तो चतुर्विध धर्मसंघ को नित नवीन आध्यात्मिक ज्ञान से आलोकित कर रहा है। इसका नित्य प्रति लाभ उठाने के लिए सुधर्मा सभा में चारित्रात्माओं के साथ-साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित होते हैं।
मंगलवार को प्रातःकालीन मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘उच्चार-प्रस्रवण के लिए निर्देश’ को आगम के माध्यम से वर्णित करते हुए कहा कि साधु के लिए पांच महाव्रत, पांच समितियां और तीन गुप्तियां- ये तेरह नियम होते हैं। हमारे धर्मसंघ का नाम भी तेरापंथ और हम चारित्रात्माओं के तेरह नियम भी हैं। पांच समितियों में पांचवीं समिति उत्सर्ग समिति है। शरीर है तो उसका भरण-पोषण भी होता है तो फिर उत्सर्ग की अपेक्षा भी होती है। अर्जन होता है तो विसर्जन का भी विधान है। शरीर का उत्सर्जन तंत्र है। आहार लेते हैं तो अर्जन होता है, पानी पीते हैं तो वह अर्जन होता है और सहज अर्जन वातावरण से भी होता होगा। अर्जन है तो उत्सर्जन की आवश्यकता होती है। उत्सर्जन शरीर की एक ऐसी आवश्यकता है कि इसके लिए कहा गया है कि जैसे साधु कहीं गया हो और मार्ग में उत्सर्ग की अपेक्षा हो गई तो शास्त्र में आदेश दिया गया है कि मल-मूत्र को धारण मत करो। उचित स्थान देखकर वहां उत्सर्जन करने का प्रयास हो। इसके वेग को प्रायः रोकना नहीं चाहिए। यह बाधा रोकने की चेष्टा नहीं होनी चाहिए। यह स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अच्छा और कार्य करने की दृष्टि से भी अच्छा होता है। उत्सर्जन हो गया तो कार्य में एकाग्रता रह सकती है।
कभी आहार भले न हो, लेकिन उत्सर्जन की स्थिति आए तो वह अनिवार्य रूप से हो जानी चाहिए। उसे धारण करने का प्रयास नहीं होना चाहिए। पंचमी समिति के लिए साधु को वर्षा के दौरान भी जाने की मनाही नहीं है। उत्सर्ग में भी अहिंसा की चेतना रहनी चाहिए। टॉयलेट में जाने पर दरवाजा बन्द करने से पहले उसका प्रतिलेखन-प्रमार्जन होना चाहिए। अहिंसा की दृष्टि से सजगता रहनी चाहिए।
मंगल प्रवचन के दौरान आचार्यश्री ने चतुर्दशी के संदर्भ में हाजरी का वाचन करते हुए कहा कि श्रावकों से ही चारित्रात्माओं को भरण-पोषण होता है। वे मानों माता-पिता के समान होते हैं। उनमें वात्सल्य भाव भी होता है। कभी कोई श्रावक भी साधु-साध्वियों को आगम आदि बंचाने में सहयोग करते थे। जो ज्ञानी श्रावक होते हैं, साधु-साध्वियों को तत्त्वज्ञान आदि सीखने सहयोग कर सकते हैं, लेकिन उसमें भी विधि-विधान का ध्यान रखने का प्रयास होना चाहिए। साधु-साध्वियों के संयम कैसे अच्छा रहें, उसमें सहयोग देने वाले हो सकते हैं। विधि के अनुसार यदि कोई श्रावक साधु में दोष देखे तो पहले उस साधु को बताओ और यदि वह नहीं माने तो गुरु आदि से बताने का प्रयास करना चाहिए। साधु-साध्वियों को भी अपने साधुपन के प्रति पूर्ण जागरूकता रखने का प्रयास करना चाहिए। जीवन भर अखण्ड साधुपन बना रहे, ऐसा प्रयास होना चाहिए। आचार्यश्री की अनुज्ञा से साध्वी पद्मप्रभाजी ने लेखपत्र का उच्चारण किया। आचार्यश्री ने साध्वीजी ने दसवेआलियं आगम के कुछ श्लोक भी सुने। आचार्यश्री ने साध्वीजी को पांच कल्याणक की बक्सीस प्रदान की। तदुपरान्त उपस्थित चारित्रात्माओं ने अपने-अपने स्थान पर खड़े होकर लेखपत्र का उच्चारण किया। इस दौरान आचार्यश्री ने साधु-साध्वियों साधन प्रयोग के संदर्भ रिपोर्ट भी प्रस्तुत करने की प्रेरणा प्रदान की।
कार्यक्रम के दौरान योगक्षेम प्रवास व्यवस्था समिति के पदाधिकारियों द्वारा आचार्यश्री के समक्ष पावस प्रवास व फड़द को लोकार्पित किया गया। इस संदर्भ में आचार्यश्री ने मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। मुनि सुमतिकुमारजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में उपासक श्रेणी प्रशिक्षण शिविर का मंचीय उपक्रम हुआ। इस संदर्भ में उपासक श्रेणी के श्री जयंतीलाल सुराणा, उपासक श्रेणी के सहसंयोजक श्री राहुल खोखावत ने अपनी अभिव्यक्ति दी। उपासक श्रेणी के संभागी सदस्यों ने गीत का संगान किया। इसके साथ ही उपासक श्रेणी प्रगति विवरण पुस्तिका भी आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित की गई।
आचार्यश्री ने उपासक श्रेणी को मंगल आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहा कि उपासक श्रेणी के सदस्य जब चद्दर ओढ़े हुए आते हैं तो एक साधु का सा कुछ रूप हो जाता है। संख्या काफी ठीक लग रही है और थोड़ा प्रयास किया जाए तो एक हजार सक्रिय सदस्यों की संख्या हो जाए तो और अच्छी बात हो सकती है। उपासक श्रेणी के सदस्य तत्त्वज्ञान आदि का विकास करते रहें। उपासक-उपासकिएं जैन धर्म तेरापंथ को बताने वाले बनें। यह श्रेणी अच्छा विकास करती रहे। इस बार उपासक-उपासिकाओं की उपयोगिता है तो खूब अच्छा कार्य होता रहे।

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