surendra Munot Associate Editor all india
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लाडनूं ,जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान देदीप्यमान महासूर्य, ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी वर्तमान समय में तेरापंथ की राजधानी लाडनूं में तेरापंथ धर्मसंघ के इतिहास का द्वितीय योगक्षेम वर्ष का प्रवास काल जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर में सुसम्पन्न कर रहे हैं। आचार्यश्री सहित करीब 450 से अधिक चारित्रात्माएं इस महामंगल प्रवास का आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं। इनके साथ-साथ हजारों-हजारों की संख्या में श्रद्धालु भी इस सुअवसर का पूर्ण लाभ प्राप्त कर रहे हैं। चतुर्मासकाल भी प्रारम्भ हो गया है। इस वर्ष का चतुर्मास काल प्रारम्भ होने से ठीक पहले युगप्रधान अनुशास्ता ने तेरापंथ धर्मसंघ को युवाचार्य प्रदान कर तेरापंथ के इतिहास में एक नवीन अध्याय जोड़ दिया है। प्रतिदिन आयोजित होने वाले प्रातःकालीन प्रवचन में प्रतिदिन के निर्धारित विषयों को युगप्रधान अनुशास्ता आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हैं। आचार्यश्री के श्रीमुख से सरल रूप में निकलने वाली अमृतवाणी चतुर्विध धर्मसंघ को मानों नवीन ऊर्जा प्रदान करती है। इस कारण जैन विश्व भारती का वातावरण आध्यात्मिक आवरणों से आच्छादित नजर आ रहा है।
शनिवार को भी सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘निर्वेद से क्या मिलेगा?’ को उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि प्रश्न किया गया कि निर्वेद से जीव क्या प्राप्त करता है? सम्यक्त्व के लक्षणों में सम, संवेग व निर्वेद की बात है। निर्वेद अर्थात वैराग्य का भाव। संसार से वैराग्य, शरीर वैराग्य और भोग वैराग्य। आदमी में संसार से विरक्ति हो जाती है। शरीर का उपयोग हो सकता है, लेकिन शरीर के प्रति भी मोह नहीं होता। साधु अपने शरीर के प्रति भी ममत्व नहीं रखते। शरीर के प्रति भी आसक्ति, आकर्षण है तो फिर आसक्ति का भाव माना जा सकता है। ये सभी बातें बाह्य आकर्षण की बात होती है। भोग वैराग्य के अंतर्गत इन्द्रिय विषयों के भोगों में आसक्ति नहीं, मोह नहीं और विरक्ति का भाव होता है। निर्वेद होने से काम-भोगों के प्रति तीव्र विकर्षण की बात हो जाती है।
आदमी ऐसी अनुप्रेक्षा और चिंतन करता है। बारह भावनाओं में अशौच अनुप्रेक्षा की बात है। उसमें शरीर की अशुचिता के विषय में बताया गया है। जिस शरीर के प्रति इतनी आसक्ति है, वह कितना अशुचि है। भोगों के प्रति भी विकर्षण का भाव होता है। भोगों के प्रति आदमी को आसक्ति से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को विषयों के प्रति आसक्ति का भाव न हो, ऐसा प्रयास होना चाहिए। आदमी परिवार में रहे तो भी आसक्ति का भाव न रखे, उसके मन में विरक्ति का भाव रखने का प्रयास होना चाहिए। जो निर्वेद होता है, वह सभी विषयों से विरक्त हो जाता है। पांचों इन्द्रियों के पांचों विषयों के प्रति विरक्त हो जाता है, वह सहज शांति में रहता है। इस प्रकार जो निर्वेद को प्राप्त हो जाता है, वह मुक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है और उसे कभी मोक्ष की प्राप्ति भी हो सकती है। निर्वेद को प्राप्त जीव अपनी आत्मा को अधोगति से बचा सकता है। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान किए।

