surendra Munot Associate Editor all india
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लाडनूं ,करीब 37 वर्षों बाद जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ का दूसरा योगक्षेम वर्ष तेरापंथ की राजधानी के रूप में विख्यात लाडनूं की धरा पर स्थित जैन विश्व भारती परिसर में तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में सानंद प्रवर्धमान है। इस योगक्षेम वर्ष के दौरान आचार्यश्री ने अपने युवाचार्यश्री की घोषणा कर इसे ऐतिहासिक बना दिया है। वहीं दूसरी ओर संघीय आयोजनों की भी मानों झड़ी-सी लगी हुई है।
शनिवार को युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में संस्था शिरोमणि जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के महनीय आयाम जो स्नेह, संस्कार व समन्वय को प्रवर्धमान बनाने वाला है, वैसे आयाम ‘बेटी तेरापंथ की’ का चतुर्थ सम्मेलन प्रारम्भ हुआ। करीब 1600 से अधिक बेटियां, दामादा व दोहिता-दोहिती अपने आध्यात्मिक पीहर पहुंचे तो इस आध्यात्मिक पीहर का माहौल ही परिवर्तित हो उठा। बेटियों की खिलखिलाहट और दोहिता-दोहितियों के मधुर कलरव से पूरा परिसर आनंदमय नजर आ रहा था। मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में मंचीय उपक्रम के दौरान बेटियों व दामाद ने गीत का संगान किया तो दोहिता-दोहितियों ने भावपूर्ण मनमोहक प्रस्तुति दी तो युगप्रधान अनुशास्ता ने सभी को पावन पाथेय प्रदान किया।
शनिवार को मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान सर्वप्रथम उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को वर्तमान अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘संसार भ्रमण: मोक्षवरण’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि शास्त्रकार ने एक आध्यात्मिक संदेश प्रदान किया कि भोगों में उपलेप होता है और जो अभोगी होता है, वह उपलिप्त नहीं होता। भोगी इस संसार में भ्रमण करता है और अभोगी इस संसार से विप्रमुक्त हो जाता है। जहां आसक्ति वहां भोग है और वहां संसार में भ्रमण है तथा जहां त्याग है, अनासक्ति है, मोक्ष की अभिलाषा है, मोक्ष का लक्ष्य है, वह अनासक्त चेतना पवित्र होती है।
आसक्ति में चेप होता है और अनासक्ति में पदार्थों का उपयोग होता है, किन्तु उसमें कोई लगाव और चेप नहीं होता। पदार्थों में आसक्ति है तो फिर संसार भ्रमण हो जाता है और पदार्थों का केवल उपयोग होता है और वहां अनासक्ति रहती है तो वहां इस संसार से मुक्ति की बात हो जाती है। एक साधु भी पदार्थों का उपयोग करता है और सामान्य आदमी को भी पदार्थों का उपयोग करता है, किन्तु दोनों में अंतर होता है। साधु अनासक्ति के भाव से पदार्थ का उपयोग करता है और सामान्य आदमी पदार्थ का उपयोग आसक्ति के साथ करता है। यदि आसक्ति के भाव को त्याग दिया जाए तो साधना व आध्यात्मिकता की दृष्टि से एक उच्चता की स्थिति आ सकती है। जीवन में सुविधाओं का संयम करने का प्रयास होना चाहिए।
आदमी को ध्यान देना चाहिए कि किसी चीज आवश्यकता कितनी है और आदमी की इच्छा कितनी है। एक बात हो कि शरीर के लिए कोई चीज अपेक्षित हो तो उसका उपयोग हो और दूसरा है कि भोग-विलास की इच्छा से तमाम तरह के पदार्थों और वस्तुओं का भोग-उपभोग किया जा रहा हो। इसलिए आदमी को जहां तक हो सके, सुविधावाद की मनोवृत्ति से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को साधारण, सादगी और संयम से युक्त जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए। आदमी जितना पदार्थों के आकर्षण से बच के रहे तो उसे उत्तम तत्त्व की प्राप्ति हो सकती है। विषयासक्ति से बचने का प्रयास हो।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान किए। नमस्कार महामंत्र के सपाद कोटि जप का शुभारम्भ आचार्यश्री ने करते हुए इस जप से जुड़े हुए लोगों को मंगल प्रेरणा प्रदान की। तदुपरान्त जैन विश्व भारती के द्वारा मुनि अनिकेतकुमारजी व साध्वी धैयप्रभाजी की संयुक्त जीवनी ‘इटरनल फुट प्रिन्ट्स’ को आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित किया गया, जिसे संयुक्त रूप से मुनि कौशलकुमारजी, साध्वी सिद्धार्थप्रभाजी व साध्वी तेजस्वीप्रभाजी ने अंग्रेजी भाषा में लिखा गया है। इस संदर्भ मंे मुनि कौशलकुमारजी और साध्वी सिद्धार्थप्रभाजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।
‘बेटी तेरापंथ की’ के मंचीय उपक्रम के दौरान ‘बेटी तेरापंथ की’ संयोजक श्रीमती कुमुद कच्छारा, जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के अध्यक्ष श्री महेन्द्र नाहटा ने अपनी अभिव्यक्ति दी। बेटियों के साथ सम्मेलन में पहुंचे दोहिता-दोहितियों ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति देते हुए नव मनोनीत युवाचार्यश्री को भी वर्धापित किया। संभागी बेटियों व दामादों ने भी पृथक्-पृथक् गीत का संगान करने के उपरान्त युवाचार्यश्री को वर्धापित किया। तत्पश्चात आचार्यश्री ने संभागियों को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि धर्म उत्कृष्ट मंगल है। अहिंसा, संयम और तप धर्म के प्रकार हैं। जिसका मन सदा धर्म में रमा रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं। जीवन में किसी को पद, पैसा और प्रतिष्ठा मिल सकती है, लेकिन धर्म की सम्पत्ति मिल जाए तो विशेष बात होती है। आदमी के जीवन धर्म रहे, ऐसा प्रयास रहना चाहिए। पिछले वर्षों की भांति बेटी तेरापंथ की आयोजन हो रहा है। इस बार जैन विश्व भारती में यह आयोजन हो रहा है। यहां अनेक धार्मिक-आध्यात्मिक गतिविधियों का क्रम रहता है। अभी यहां सैंकड़ों चारित्रात्माएं विद्यमान हैं। आचार्यश्री ने संभागियों को नव मनोनीत युवाचार्यश्री का परिचय भी कराया। आचार्यश्री ने संभागियों को तेरापंथ धर्मसंघ के संदर्भ में भी अवगति प्रदान करते हुए कहा कि ससुराल जाना तो संसार की व्यवस्था है। बेटियों का आना तो ठीक है, लेकिन दामाद का आना खास बात है। हालांकि यह सांसारिक रिश्ता होता है, लेकिन धर्म से जुड़ाव होना अच्छी बात है। बच्चों में अहिंसा, नैतिकता का अच्छा विकास हो। भौतिकता के युग में बच्चों के भीतर अच्छे संस्कार आएं, बच्चों में भीतर की शांति बनी रहे। आध्यात्मिकता के संस्कार रहने से आदमी तनाव आदि से भी बच सकता है। धर्म आत्मा की शुद्धि करने वाला और मन को शांति प्रदान करने वाला होता है। बेटियां जहां जाएं वहां स्वर्ग बना दें तो बहुत अच्छी बात हो सकती है। परिवार में शांतिमय माहौल हो, सभी में धर्म के संस्कार आएं तो बहुत अच्छी बात होती है। यह दो दिनों समय अच्छा निष्पत्तिपूर्ण हो।

