सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
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लाडनूं,राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले के लाडनूं स्थित जैन विश्व भारती परिसर में योगक्षेम वर्ष के मंगल प्रवास के दौरान जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आज उत्तराध्ययन आगम के तीसरे अध्ययन पर तात्त्विक और दार्शनिक मीमांसा का वर्णन किया। आज के अवसर पर बालोतरा के समागत ज्ञानशाला के नन्हें मुन्हें ज्ञानार्थियों ने गुरुदेव के समक्ष विभिन्न प्रस्तुतियां दी।
सुधर्मा सभा को संबोधित करते हुए युगप्रधान आचार्य श्री ने फरमाया कि धर्म का श्रवण करना अच्छी बात है, किंतु सुनी हुई बात पर भक्तिपूर्वक विश्वास और आस्था का जग जाना इस संसार में परम दुर्लभ है। जब तक व्यक्ति के भीतर दर्शन मोहनीय और अनंतानुबंधी कषायों का क्षय या विलय नहीं होता, तब तक सम्यग्दर्शन अर्थात यथार्थ के प्रति सत्योन्मुखी अभिरुचि प्राप्त नहीं हो सकता। ज्ञान, दर्शन और चारित्र के बीच श्रद्धा ही वह मजबूत सेतु है, जिसके बिना आचरण का मार्ग बहुत दूर रह जाता है। यदि व्यक्ति के भीतर सच्ची श्रद्धा और आस्था का बल जाग जाए, तो वह प्राणों का संकट आने पर भी धर्म शासन को नहीं छोड़ता और कठिन से कठिन पथ पर भी समतापूर्वक आगे बढ़ सकता है। कुमार श्रमण केशी जैसे महापुरुषों ने इसी श्रद्धा के बल पर राजा प्रदेशी जैसे नास्तिक को भी आस्तिक बनाकर धर्म के मार्ग पर ला खड़ा किया था।
ज्ञान को कंठस्थ करने पर विशेष बल देते हुए आचार्य श्री ने संत-साध्वियों और समणियों को शिक्षा देते हुए कहा कि आज कंप्यूटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का युग है, जहाँ सब कुछ आसानी से उपलब्ध है, परंतु जो ज्ञान साधक के दिमाग में पूर्णतः कंठस्थ और सुरक्षित है, उसकी महिमा अद्वितीय है। केवल किताब के सहारे किया गया स्वाध्याय बूढ़े की लाठी के समान है, जो बिना रोशनी के रात में काम नहीं आता। गुरुदेव ने परम पूज्य आचार्य भिक्षु और आचार्य तुलसी जैसे महापुरुषों का स्मरण कराते हुए कहा कि उन्होंने हजारों-हजार गाथा प्रमाण ज्ञान कंठस्थ किया था। सभी को भी दशवैकालिक, उत्तराध्ययन और आवश्यक सूत्रों को निरंतर पुनरावर्तन कर पक्का कंठस्थ करना चाहिए, क्योंकि यह श्रुत और कंठस्थ ज्ञान ही हमारे भीतर वैराग्य की सुरक्षा करता है और मति को निर्मल बनाता है।

