
सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
Key Line Times
लाडनूं,अहिंसा यात्रा द्वारा नेपाल, भूटान सहित भारत के 21 राज्यों की यात्रा कर अहिंसा की नव चेतना का जागरण करने वाले शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य से प्राचीन चंदेरी नाम से विख्यात लाडनूं नगर आध्यात्मिक आभा को प्राप्त कर रहा है। योगक्षेम वर्ष के संदर्भ में नित्य नवीन विषयों पर आचार्य प्रवर द्वारा उद्बोधन, प्रशिक्षण प्राप्त कर साधु साध्वियों के साथ साथ श्रावक समाज भी आगम शास्त्रों के गूढ़ सूत्रों को गुरूदेव द्वारा की जाने वाली सरल व्याख्या से आत्मसात कर रहा है। सुधर्मा सभा में मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के साथ साथ दिनभर में विभिन्न विषयों पर होने वाली कक्षाएं, सेमिनार भी आकर्षण का केंद्र बने हुए है।
प्रवचन सभा में मंगल धर्म देशना देते हुए आचार्य प्रवर ने कहा – उत्तराध्ययन आगम का प्रथम अध्ययन विनय और अनुशासन का शिक्षण देने वाला है। नव दीक्षित साधु साध्वियों और हम सभी के लिए यह बात है कि विनय और अनुशासन की शिक्षा ग्रहण करें और आगम में जो संदेश मिलते हैं उनका निरंतर स्वाध्याय करते रहें। यह आगम हम चारित्र आत्माओं के लिए एक सुंदर मार्गदर्शक है। कंठस्थ करने के साथ-साथ समय-समय पर उसका वाचन करते रहें। हमें यह भाव रखना चाहिए कि मैं आगम की शरण ले रहा हूँ ताकि उनसे मुझे त्राण और उचित मार्गदर्शन मिले तथा मेरी साधना का क्रम सुचारू रूप से चलता रहे। जैन धर्म की श्वेतांबर परंपरा में हमारे मान्य 32 आगम हमारे लिए बहुत बड़ी संपत्ति और निधि हैं, जिन्हें आत्मसात करना साधु साध्वियों के लिए एक अच्छी खुराक और पोषण बन सकता है।
आज के विषय के संदर्भ में गुरूदेव ने आगे कहा कि आचार्य जब अनुशासन करते हैं, तो वे अपनी वाणी से कड़ा भी कह सकते हैं और उनके व्यवहार में थोड़ी कठोरता भी दिखाई दे सकती है। आचार्य अनुशासन व्यवस्था और साधु साध्वियों की चित्त समाधि दोनों का संतुलन बनाए रखते है। न तो समाधि भंग हो और न ही अनुशासन की डोर इतनी ढीली हो जाए कि कोई कुछ भी करने लगे। यदि आचार्य उपलब्ध भी दे तो साधु-साध्वियों का यह परम धर्म है कि वे उसे सहन करें और यथोचित विनयपूर्ण व्यवहार रखें। शिष्य को यह चिंतन कर स्वीकार करना चाहिए कि ये हमारे गुरु हैं और जो फरमाएंगे, हित के लिए फरमाएंगे। हम उसे अपनी झोली में सहर्ष ग्रहण करेंगे। शिष्य का भाव यही होना चाहिए कि हमारा मस्तक आपके चरणों में है, आप जो फरमाएंगे हम उसे शिरोधार्य करेंगे। जीवन में इसी विनयपूर्ण दृष्टिकोण के साथ गुरु के अनुशासन और उलाहने को स्वीकार करना ही हमारे लिए कल्याणकारी होता है।
कार्यक्रम में प्रश्नोत्तर के क्रम पश्चात मुनि जय कुमार जी ने अपने विचारों की अभिव्यक्ति दी।
आचार्य प्रवर ने आज से प्रारंभ होने वाले प्रेक्षाध्यान शिविर के संभागी श्रावक श्राविकाओं को शिविर की उपसंपदा स्वीकार कराई। बहिर्विहार से समागत साध्वी श्री विशदप्रज्ञा जी, साध्वी श्री मार्दव प्रभा जी आदि साध्वी वृंद ने गुरू चरणों में भाषण एवं सामूहिक गीत द्वारा प्रस्तुति दी।

