सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
Key Line Times
लाडनूं,जैन विश्व भारती, लाडनूं की पावन धरा पर नव संवत्सर (विक्रम संवत 2083) के मंगल अवसर पर अध्यात्म और उल्लास का अपूर्व संगम देखने को मिला। परमपूज्य गुरुदेव आचार्य श्री महाश्रमण जी के श्रीमुख से वृहद मंगलपाठ श्रवण कर श्रद्धालुओं ने आध्यात्ममय नव संवत्सर का आगाज किया। इसी के साथ आचार्य वर की प्रेरणा से श्रावक समाज ने वर्ष भर हेतु त्याग-संकल्प भी स्वीकार किए।
सुधर्मा सभा में संबोधित करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण जी ने फरमाया कि नया वर्ष आता है, जन्म दिवस आता है तो लोगों के मन में बड़ा उत्साह और उमंग का भाव होता है। परंतु इस उल्लास के साथ व्यक्ति के दिमाग में यह बात भी रहनी चाहिए कि मेरे जीवन का एक वर्ष और कम हो गया है, समय रूपी खजाने में थोड़ी कमी ही आ रही है। समय तो बारिश के पानी की तरह मुफ्त में बरस रहा है, अब कोई उससे बाल्टी या कुंड भर लेता है और उसका सदुपयोग कर लेता है, तो किसी का पानी यों ही नाली में बहकर व्यर्थ हो जाता है। ‘टाइम इज मनी’ समय ही धन है। जैसे एक कंजूस आदमी पैसे खर्च करने से पहले सोचता है कि कहाँ लगाऊँ और कहाँ नहीं, ठीक वैसे ही हमें अपना समय व्यतीत करने से पहले गहराई से सोचना चाहिए। समय को व्यर्थ मत गँवाओ। हमें मिलने वाले 24 घंटों का सुंदर प्रबंधन होना चाहिए। परिस्थितियां चाहे जो हों, परंतु व्यक्ति के उठने और सोने का समय मोटा-मोटी निर्धारित अवश्य होना चाहिए।
गुरुदेव ने आगे कहा कि समय के तीन रूप हैं – सदुपयोग, दुरुपयोग और अनुपयोग। स्वाध्याय, सेवा, ध्यान और अच्छे कार्यों में समय लगाना सदुपयोग है। किसी की फालतू निंदा करने या किसी प्राणी को तकलीफ देने में समय लगाना दुरुपयोग है, और बिना कुछ किए केवल आलस्य में बैठे रहना अनुपयोग है। प्रकृति निष्पक्ष होकर सबको एक समान 24 घंटे देती है, अब यह हम पर निर्भर है कि हम उसका कैसा उपयोग करते हैं। पूर्व आचार्यों का स्मरण करते हुए गुरुदेव ने बताया कि आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी की जीवन शैली और समय प्रबंधन कितना अद्भुत था कि 90 वर्ष के जीवनकाल में, अपने महाप्रयाण के अंतिम दिन तक भी उन्होंने प्रवचन, आसन और आगम का कार्य किया। सभी यह संकल्प लें कि हम अपने समय का अधिकाधिक सदुपयोग करेंगे और अपनी आत्मा के कल्याण की दिशा में निरंतर आगे बढ़ेंगे।

