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February 24, 2026

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🌸 *सम्यक् ज्ञान व दर्शन है आचार की पृष्ठभूमि : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण* 🌸 *-आचार्यश्री ने आचार को प्रामाणिक बनाने की दी पावन प्रेरणा* *-आज भी अनेक चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को मिला समाधान* *-अभातेमम को पूज्य सन्निधि में मिला एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड सम्मान* *24.02.2026, मंगलवार, लाडनूं, डीडवाना-कुचामन (राजस्थान) :* जैन विश्व भारती परिसर में साधिक एक वर्ष के लिए विराजमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में योगक्षेम वर्ष की कालावधि प्रारम्भ हो चुकी है। इस अवधि के दौरान बहने वाली आध्यात्मिक ज्ञानगंगा में चारित्रात्माओं के साथ-साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी गोते लगा रहे हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचने वाले श्रद्धालु भी इस अवसर का पूर्ण लाभ उठा रहे हैं। दूर क्षेत्रों से समागत श्रद्धालुओं के कारण जैन विश्व भारती और अधिक गुलजार दिखाई दे रहा है। मंगलवार को सुधर्मा सभा में मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम का शुभारम्भ युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ हुआ। तदुपरान्त साध्वीवृंद ने प्रज्ञागीत का संगान किया। युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित जनता को आज के निर्धारित विषय ‘आचार की पृष्ठभूमि’ पर आधारित मंगल पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि ‘आचार की पृष्ठभूमि’ आज का विषय है। आदमी सदाचार के पथ पर चलता है, उच्च आचार का पालन करता है। साधुत्व के रूप में, श्रावकत्व के रूप में और बिना साधु व श्रावक के एक सामान्य आदमी कोई अणुव्रत आन्दोलन की आचार संहिता आदि को मानकर अथवा अपने ढंग से सदाचार का पालन कर सकता है। प्रश्न हो सकता है कि किस भूमिका के आधार पर आचार का पालन हो सकता है? इसके लिए एक समाधान दिया गया है कि चारित्र सम्यक्त्व विहीन नहीं हो सकता। यदि सम्यक्त्व नहीं है तो सम्यक् आचार और सम्यक् चारित्र हो नहीं सकता। सम्यक् दर्शन व सम्यक् ज्ञान सम्यक् आचार की पृष्ठभूमि हो सकती है। हम सामन्य तैर पर देंखें तो सम्यक्त्व के बिना सम्यक् आचार नहीं आ सकता। ज्ञान को आचार तक लाने के लिए दर्शन रूपी सेतु की आवश्यकता होती है। आदमी के संस्कार जितने पुष्ट हो जाएं तो वह उनके आचार में भी परिणत हो सकता है। संस्कार और विचार को भी आचार की पृष्ठभूमि में माना जा सकता है। ज्ञान, दर्शन को आचार की पृष्ठभूमि में देखा जा सकता है। आदमी का व्यवहार प्रामाणिक होना चाहिए। आदमी को अपना व्यवहार प्रामाणिक रखने का प्रयास करना चाहिए। कोई बात बतानी है तो पहले उस बात का प्रमाण भी साथ में होना चाहिए। बातों में प्रमाणिकता को सूक्ष्मता से भी ध्यान देने का प्रयास किया जा सकता है। इसलिए आदमी का व्यवहार भी प्रमाणिकता से पूर्ण होना चाहिए। आचार की पृष्ठभूमि में सम्यक् ज्ञान व सम्यक् दर्शन पुष्ट रहें तो आचार भी सम्यक् हो सकता है। आज आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल के एशिया बुक ऑफ रिकार्ड का सम्मान समारोह समायोजित किया गया। विश्व कैंसर जागरूकता दिवस के अवसर पर अभातेमम ने अपने 309 शाखा मण्डलों के माध्यम से 17200 पैप स्मीयर टेस्ट कराया जो एरिया बुक ऑफ रिकार्ड में दर्ज हुआ। इस संदर्भ में आयोजित कार्यक्रम में सर्वप्रथम तेरापंथ महिला मण्डल-लाडनूं व अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल की सदस्याओं ने गीत का संगान किया। अभातेमम की अध्यक्ष श्रीमती सुमन नाहटा ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड के अधिकृत प्रतिनिधि श्री संजय फूला ने भी अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी। उन्होंने इस रिकॉर्ड से संबंधित सर्टिफिकेट व मैडेल को अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल के पदाधिकारियों को प्रदान किया गया। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। 1 min read

🌸 *सम्यक् ज्ञान व दर्शन है आचार की पृष्ठभूमि : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण* 🌸 *-आचार्यश्री ने आचार को प्रामाणिक बनाने की दी पावन प्रेरणा* *-आज भी अनेक चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को मिला समाधान* *-अभातेमम को पूज्य सन्निधि में मिला एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड सम्मान* *24.02.2026, मंगलवार, लाडनूं, डीडवाना-कुचामन (राजस्थान) :* जैन विश्व भारती परिसर में साधिक एक वर्ष के लिए विराजमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में योगक्षेम वर्ष की कालावधि प्रारम्भ हो चुकी है। इस अवधि के दौरान बहने वाली आध्यात्मिक ज्ञानगंगा में चारित्रात्माओं के साथ-साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी गोते लगा रहे हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचने वाले श्रद्धालु भी इस अवसर का पूर्ण लाभ उठा रहे हैं। दूर क्षेत्रों से समागत श्रद्धालुओं के कारण जैन विश्व भारती और अधिक गुलजार दिखाई दे रहा है। मंगलवार को सुधर्मा सभा में मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम का शुभारम्भ युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ हुआ। तदुपरान्त साध्वीवृंद ने प्रज्ञागीत का संगान किया। युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित जनता को आज के निर्धारित विषय ‘आचार की पृष्ठभूमि’ पर आधारित मंगल पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि ‘आचार की पृष्ठभूमि’ आज का विषय है। आदमी सदाचार के पथ पर चलता है, उच्च आचार का पालन करता है। साधुत्व के रूप में, श्रावकत्व के रूप में और बिना साधु व श्रावक के एक सामान्य आदमी कोई अणुव्रत आन्दोलन की आचार संहिता आदि को मानकर अथवा अपने ढंग से सदाचार का पालन कर सकता है। प्रश्न हो सकता है कि किस भूमिका के आधार पर आचार का पालन हो सकता है? इसके लिए एक समाधान दिया गया है कि चारित्र सम्यक्त्व विहीन नहीं हो सकता। यदि सम्यक्त्व नहीं है तो सम्यक् आचार और सम्यक् चारित्र हो नहीं सकता। सम्यक् दर्शन व सम्यक् ज्ञान सम्यक् आचार की पृष्ठभूमि हो सकती है। हम सामन्य तैर पर देंखें तो सम्यक्त्व के बिना सम्यक् आचार नहीं आ सकता। ज्ञान को आचार तक लाने के लिए दर्शन रूपी सेतु की आवश्यकता होती है। आदमी के संस्कार जितने पुष्ट हो जाएं तो वह उनके आचार में भी परिणत हो सकता है। संस्कार और विचार को भी आचार की पृष्ठभूमि में माना जा सकता है। ज्ञान, दर्शन को आचार की पृष्ठभूमि में देखा जा सकता है। आदमी का व्यवहार प्रामाणिक होना चाहिए। आदमी को अपना व्यवहार प्रामाणिक रखने का प्रयास करना चाहिए। कोई बात बतानी है तो पहले उस बात का प्रमाण भी साथ में होना चाहिए। बातों में प्रमाणिकता को सूक्ष्मता से भी ध्यान देने का प्रयास किया जा सकता है। इसलिए आदमी का व्यवहार भी प्रमाणिकता से पूर्ण होना चाहिए। आचार की पृष्ठभूमि में सम्यक् ज्ञान व सम्यक् दर्शन पुष्ट रहें तो आचार भी सम्यक् हो सकता है। आज आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल के एशिया बुक ऑफ रिकार्ड का सम्मान समारोह समायोजित किया गया। विश्व कैंसर जागरूकता दिवस के अवसर पर अभातेमम ने अपने 309 शाखा मण्डलों के माध्यम से 17200 पैप स्मीयर टेस्ट कराया जो एरिया बुक ऑफ रिकार्ड में दर्ज हुआ। इस संदर्भ में आयोजित कार्यक्रम में सर्वप्रथम तेरापंथ महिला मण्डल-लाडनूं व अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल की सदस्याओं ने गीत का संगान किया। अभातेमम की अध्यक्ष श्रीमती सुमन नाहटा ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड के अधिकृत प्रतिनिधि श्री संजय फूला ने भी अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी। उन्होंने इस रिकॉर्ड से संबंधित सर्टिफिकेट व मैडेल को अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल के पदाधिकारियों को प्रदान किया गया। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।

गंता को गंतव्य तक पहुंचाने में मार्गदर्शक का बहुत महत्त्व : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण* 🌸 *-योगक्षेम वर्ष में आचार्यश्री ने प्रदान की पावन प्रेरणा* *-साध्वी सूरजकुमारीजी की स्मृतिसभा का हुआ आयोजन* *21.02.2026, शनिवार, लाडनूं, डीडवाना-कुचामन (राजस्थान) :* करीब 37 वर्षों बाद जैन विश्व भारती, लाडनूं में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में योगक्षेम वर्ष का मंगल शुभारम्भ हो गया है। शनिवार को शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ आज के मुख्य प्रवचन कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। तदुपरान्त साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया। शांतदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि पांच शब्द हैं- गंता, गंतव्य, गति, मार्ग व मार्गदर्शक। चलने वाला अथवा गमन करने वाला व्यक्ति गंता होता है। चलने वाला व्यक्ति को जहां पहुंचना है, जो लक्ष्य होता है, वह गंतव्य हो जाता है। गंता और गंतव्य के मिलन किए गंता को गति करनी होती है। गति होती है तो गंता और गंतव्य का मिलन हो सकेगा। प्रश्न हो सकता है कि गंता किधर करे? उत्तर दिया गया कि गंतव्य तक जाने के लिए गंता को निर्धारित मार्ग पर गति करनी होती है, किन्तु कौन-सा मार्ग गंतव्य तक ले जाएगा, इसके लिए मार्गदर्शक की अपेक्षा होती है। ये पांच चीजें मिलती हैं तो कोई गंता गंतव्य तक पहुंच सकता है। अध्यात्म के संदर्भ में साधना करने वाला व्यक्ति गंता होता है। उसका गंतव्य मोक्ष होता है। ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप के मार्ग होता है और इस गति करने से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है, किन्तु इन पर गति करने के लिए कोई मार्गदर्शक होना चाहिए। मार्ग दिखाने वाले तीर्थंकर, गुरु व साधु मार्गदर्शक बनते हैं। मोक्ष जाने के लिए चार मार्ग बताए गए हैं। इस जीवन में सम्यक्त्व का भी बहुत महत्त्व है। सम्यक् दर्शन के बिना सम्यक् ज्ञान नहीं होता और ज्ञान के बिना सम्यक् चारित्र की प्राप्ति नहीं और चारित्र की प्राप्ति के बिना मोक्ष की प्राप्ति संभव नहीं होती। इस संदर्भ में सम्यक्त्व के महत्त्व को जाना जा सकता है। आचार्यश्री ने आगे कहा कि योगक्षेम वर्ष के दौरान जो प्राप्त नहीं है, उसे प्राप्त करने का अच्छा मौका है। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने एक जिज्ञासा को अवसर प्रदान किया तो एक साध्वीजी ने अपनी जिज्ञासा की तो आचार्यश्री ने उन्हें समाधान प्रदान किया। आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में 20 फरवरी को लाडनूं में ही स्थित साध्वी सेवा मंदिर में दिवंगत हुई साध्वी सूरजकुमारीजी की स्मृति सभा का आयोजन हुआ, जिसमें आचार्यश्री ने उनका संक्षिप्त जीवन परिचय प्रदान करते हुए उनकी आत्मा के प्रति आध्यात्मिक मंगलकामना की। आचार्यश्री के साथ चतुर्विध धर्मसंघ ने चार लोगस्स का ध्यान किया। इस अवसर पर मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी, साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने दिवंगत साध्वीजी के आत्मा के आध्यात्मिक ऊर्ध्वारोहण की मंगलकामना की। 1 min read

गंता को गंतव्य तक पहुंचाने में मार्गदर्शक का बहुत महत्त्व : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण* 🌸 *-योगक्षेम वर्ष में आचार्यश्री ने प्रदान की पावन प्रेरणा* *-साध्वी सूरजकुमारीजी की स्मृतिसभा का हुआ आयोजन* *21.02.2026, शनिवार, लाडनूं, डीडवाना-कुचामन (राजस्थान) :* करीब 37 वर्षों बाद जैन विश्व भारती, लाडनूं में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में योगक्षेम वर्ष का मंगल शुभारम्भ हो गया है। शनिवार को शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ आज के मुख्य प्रवचन कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। तदुपरान्त साध्वीवृंद ने प्रज्ञा गीत का संगान किया। शांतदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि पांच शब्द हैं- गंता, गंतव्य, गति, मार्ग व मार्गदर्शक। चलने वाला अथवा गमन करने वाला व्यक्ति गंता होता है। चलने वाला व्यक्ति को जहां पहुंचना है, जो लक्ष्य होता है, वह गंतव्य हो जाता है। गंता और गंतव्य के मिलन किए गंता को गति करनी होती है। गति होती है तो गंता और गंतव्य का मिलन हो सकेगा। प्रश्न हो सकता है कि गंता किधर करे? उत्तर दिया गया कि गंतव्य तक जाने के लिए गंता को निर्धारित मार्ग पर गति करनी होती है, किन्तु कौन-सा मार्ग गंतव्य तक ले जाएगा, इसके लिए मार्गदर्शक की अपेक्षा होती है। ये पांच चीजें मिलती हैं तो कोई गंता गंतव्य तक पहुंच सकता है। अध्यात्म के संदर्भ में साधना करने वाला व्यक्ति गंता होता है। उसका गंतव्य मोक्ष होता है। ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप के मार्ग होता है और इस गति करने से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है, किन्तु इन पर गति करने के लिए कोई मार्गदर्शक होना चाहिए। मार्ग दिखाने वाले तीर्थंकर, गुरु व साधु मार्गदर्शक बनते हैं। मोक्ष जाने के लिए चार मार्ग बताए गए हैं। इस जीवन में सम्यक्त्व का भी बहुत महत्त्व है। सम्यक् दर्शन के बिना सम्यक् ज्ञान नहीं होता और ज्ञान के बिना सम्यक् चारित्र की प्राप्ति नहीं और चारित्र की प्राप्ति के बिना मोक्ष की प्राप्ति संभव नहीं होती। इस संदर्भ में सम्यक्त्व के महत्त्व को जाना जा सकता है। आचार्यश्री ने आगे कहा कि योगक्षेम वर्ष के दौरान जो प्राप्त नहीं है, उसे प्राप्त करने का अच्छा मौका है। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने एक जिज्ञासा को अवसर प्रदान किया तो एक साध्वीजी ने अपनी जिज्ञासा की तो आचार्यश्री ने उन्हें समाधान प्रदान किया। आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में 20 फरवरी को लाडनूं में ही स्थित साध्वी सेवा मंदिर में दिवंगत हुई साध्वी सूरजकुमारीजी की स्मृति सभा का आयोजन हुआ, जिसमें आचार्यश्री ने उनका संक्षिप्त जीवन परिचय प्रदान करते हुए उनकी आत्मा के प्रति आध्यात्मिक मंगलकामना की। आचार्यश्री के साथ चतुर्विध धर्मसंघ ने चार लोगस्स का ध्यान किया। इस अवसर पर मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी, साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने दिवंगत साध्वीजी के आत्मा के आध्यात्मिक ऊर्ध्वारोहण की मंगलकामना की।

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