
सुरेंद्र मुनोत, सहायक संपादक संपूर्ण भारत
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गांधीनगर (गुजरात),साबरमती नदी के तट पर स्थित अहमदाबाद के कोबा में वर्ष 2025 का चतुर्मास सुसम्पन्न करके जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी पुनः गतिमान हो चुके हैं। शुक्रवार को प्रातःकाल की मंगल बेला में शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने बोरिज स्थित विश्व मैत्री धाम से गतिमान हुए। देश भर में अब सर्दी का मौसम अपना रंग दिखाने लगा है, किन्तु इस क्षेत्र में अभी ठंड का बहुत ज्यादा प्रभाव दिखाई नहीं दे रहा है। लोगों को मंगल आशीष प्रदान करते हुए महातपस्वी आचार्यश्री करीब 12 किलोमीटर का विहार कर चिलोड़ा में स्थित चन्द्रप्रभ लब्धि धाम में पधारे। धाम से संबंधित लोगों को शांतिदूत आचार्यश्री का भावभीना अभिनंदन किया।चन्द्रप्रभ लब्धि धाम परिसर में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित जनता को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि मनुष्य जीवन में धर्म की आराधना करना बहुत अच्छा कार्य होता है। आदमी के आचरणों में भी धर्म का प्रभाव रहे। इसके साथ धार्मिक साधना के रूप में सामायिक, जप, ध्यान इस रूप में भी धर्म की आराधना होनी चाहिए। धर्म को दो भागों में बांटा जा सकता है-कालित धर्म और कालातित धर्म। जिस धर्म में समय लगाना पड़े कालित और जिस धर्म में अलग से कोई समय न लगाना पड़े वह कालातित धर्म होता है। उदाहरण के रूप में देखें तो सामायिक करना है तो उसके लिए लगभग पचास मिनट का समय लगाना पड़ेगा। पौषध करना है तो उसमें पौषध के संकल्प के अनुसार पौषध करेंगे तो यह हो सकता है। कालातित धर्म के रूप में उपवास को मान लें। जैसे उपवास का संकल्प हो गया, उसके बाद कोई घर में रहे, बाहर जाए, कोई कार्य भी करे तो क्षमतानुसार कर सकता है, लेकिन उसके धर्म तो चल ही रहा है। उसके लिए अलग से कोई टाइम लगाने की जरूरत नहीं। चोरी का त्याग, हिंसा का त्याग कर लेना आदि ऐसा धर्म है कि इसमें भी अलग से समय नहीं लगाना पड़ता। संकल्प कर लिया और उसके पालन के प्रति मनोबल मजबूत कर लिया तो आपके धर्म की अनुपालना हो रही है। दुकान में किसी ग्राहक को नहीं ठगना, कूट माप-तौल आदि से बचने का प्रयास करना चाहिए। झूठ का त्याग कर लेना आदि कालातित धर्म हो जाता है।परम पूज्य आचार्यश्री तुलसी ने अणुव्रत आन्दोलन चलाया। उसके छोटे-छोटे नियम स्वीकार कर लिया तो वह आफिस में जाए, कोई कार्य आदि करे, वहां ईमानदारी और नैतिकता के संकल्प को स्वीकार कर लेने का प्रयास करना चाहिए। ईमानदारी के सामने परेशानी आ सकती है, किन्तु विजय तो सत्य की ही होती है। गृहस्थ जीवन में जितना संभव हो सके, मृषावाद आदि से बचकर धर्म के पथ पर चलने का प्रयास करना चाहिए।आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त मुनि अर्हम्कुमारजी ने अंग्रेजी भाषा में ‘धर्म के महत्त्व’ विषय पर अपनी विचाराभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने मुनि अर्हम्कुमारजी को अगले 14 व 15 नवम्बर को अगले विषय पर अंग्रेजी भाषा में भाषण देने की प्रेरणा प्रदान करते हुए मुनि अर्हम्कुमारजी को सात कल्याणक बक्सीस किए। तदुपरान्त आचार्यश्री ने समणियों को भाषण के लिए विभिन्न विषय प्रदान किए। चन्द्रप्रभ लब्धि धाम के मुख्य ट्रस्टी श्री जिग्नेशभाई मेहता ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।

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