surendra Munot Associate Editor all india
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24.07.2026, शुक्रवार, लाडनूं ,जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शुक्रवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आगमवाणी के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि कर्म बलवान होते हैं। आदमी पुण्य और पाप जैसे कोई भी कर्म करता है और उनका जैसे उदयकाल होता है तो प्राणी को उस कर्म का फल भोगना होता है। इसलिए आदमी को निकृष्ट कर्म करने से बचने का प्रयास करना चाहिए। साधु को तो विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए कि उससे कोई प्रमाद न हो जाए। बड़े से बड़े व्यक्ति को भी अपने कर्मों का फल भोगना होता है। इसलिए कर्म को बलवान कहा गया है। धर्माचार्य के कर्म भी उदय में आते हैं तो उन्हें भोगना ही होता है। कर्म जैसा निष्पक्ष कोई नहीं होता। कोई छोटा हो, बड़ा हो, राजा हो या रंक हो, कर्म किसी को नहीं छोड़ता। कर्मवाद जैन धर्म का मुख्य सिद्धांत है। इस प्रकार आदमी को अच्छे कर्म करने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि प्रश्न हो सकता है कि श्रमण कौन होता है? उत्तर दिया गया कि समता से श्रमण होता है। जो समता की साधना करता है, वह श्रमण होता है। साधु के जीवन में समता की साधना होनी ही चाहिए। जो समता में रहता है, वह कितना सुखी हो सकता है। कहा गया है कि इस संसार में समता की साधना करने वाले साधु सुखी हैं।
साधु-संतों में समता की साधना का प्रयास होना चाहिए। साधु को शांत सहवास करने का प्रयास करना चाहिए। बड़े समुदाय में रहें या न्यारे में रहें, समता की साधना होती रहे। तपस्या भी होती रहे, सेवा भी होती रहे और स्वभाव को भी शांत बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। ज्ञान के विकास का भी प्रयास होना चाहिए। जिसके पास ज्ञान होता है, उसे दूसरों को ज्ञान देने का प्रयास करना चाहिए। निःसंकोच रूप से ज्ञान देने का प्रयास होना चाहिए। जो ज्ञानी हो और शांतिमान भी हो और अध्यापन करने में भी समय लगाए तो लोगों का कितना कल्याण हो सकता है और उसके स्वयं का जीवन भी बहुत अच्छा हो सकता है। आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन के दौरान ऊँ भिक्षु-जय भिक्षु का जप भी कराया।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में कल अर्थात् 23 जुलाई को देवलोकगमन हुई शासनश्री साध्वी सुप्रभाजी की स्मृतिसभा का आयोजन हुआ, जिसमें आचार्यश्री ने उनका संक्षिप्त जीवन परिचय प्रदान करते हुए उनकी आत्मा के लिए आध्यात्मिक मंगलकामना की। तदुपरान्त आचार्यश्री के साथ चतुर्विध धर्मसंघ ने चार लोगस्स का ध्यान किया। तत्पश्चात मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी, साध्वीप्रमुखा साध्वी विश्रुतविभाजी, साध्वीवर्या साध्वी सम्बुद्धयशाजी ने भी उनकी आत्मा के प्रति मंगलकामना की। शासन गौरव साध्वी राजीमतीजी ने भी उनकी आत्मा के प्रति मंगलकामना की। साध्वीवृन्द ने इस संदर्भ में सामूहिक गीत का संगान किया। शासन गौरव साध्वी कनकश्रीजी, शासन गौरव साध्वी कल्पलताजी, शासनश्री साध्वी जिनप्रभाजी, शासनश्री साध्वी विमलप्रज्ञाजी, साध्वी मनीषाश्रीजी, साध्वी मुकुलयशाजी, साध्वी निर्मलयशाजी, साध्वी मृदुलयशाजी, साध्वी संघप्रभाजी, साध्वी रोहिणीप्रभाजी व समणी कुसुमप्रज्ञाजी, मुनि कमलकुमारजी, मुनि रजनीशकुमारजी व मुनि मार्दवकुमारजी ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। उनके संसारपक्षीय परिवार की ओर से श्री रूपचंद दुगड़, श्री विनोद छाजेड़ व श्री अशोक लुणिया ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी।

