surendra Munot Associate Editor all india
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11.07.2026, शनिवार, लाडनूं ,जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शनिवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘पाश बहुल संसार: कैसे मुक्त विहार?’ को आगम के माध्यम से वर्णित करते हुए कहा कि इस संसार में बहुत से प्राणी पाश से बद्ध हैं। इस पाशबद्ध संसार में रहते हुए भी पाश मुक्त होकर कैसे विहार हो सकता है? गृहस्थ लोग स्नेह के, मोह के पाश में फंसे हुए हैं। धन-दौलत, पद-प्रतिष्ठा, मान-सम्मान, कुल-खानदान आदि-आदि सभी मोह रूपी पाश हैं, जिससे मानव आबद्ध है। यह संबंधों का संसार है।इसका उत्तर प्रदान करते हुए कहा कि संत इन पाशों से मुक्त होते हैं। साधु की यह विशेषता होती है कि साधु संबंधातीत होता है। भगवान गौतम ने कहा कि मैंने पाशों का नाश कर दिया है। तीव्र स्नेह, राग, द्वेष रूपी पाशों का छेदन कर अलिप्त जीवन जीने वाले साधु होते हैं। साधु संसार में रहते हुए भी संबंधों से अलिप्त होता है। राग-द्वेष और स्नेह रूपी पाश को काटने का प्रयास करना चाहिए। हालांकि वर्तमान में संसार का परिवार तो छोड़ दिया, किन्तु धर्मसंघ के बड़े परिवार में आ गए हैं। यह धार्मिक संबंध है।
साधु के जीवन में भी राग की भावना हो सकती है। अपने शिष्य अथवा गुरु के प्रति राग का भाव हो सकता है, लेकिन साधु व संसारी के राग-राग में अंतर भी होता है। फिर भी साधु को राग तो कभी पूर्ण रूपेण मुक्त होना ही पड़ेगा। राग ऐसा है तत्त्व है जो सबसे बाद में समाप्त होने वाला है। जब तक राग समाप्त नहीं होता, तब तक साधु वीतराग नहीं बन सकता।
राग-द्वेष की मुक्ति की साधना करने का प्रयास करना चाहिए। दुराग्रह के रूप में भी कोई राग नहीं होना चाहिए। आग्रहहीन चेतना का विकास करने का प्रयास होना चाहिए। ज्ञानी की बात को सुनने का प्रयास होना चाहिए। ज्ञान की बात जहां भी प्राप्त हो, वहां से ग्रहण कर लेने का प्रयास करना चाहिए।
राग-द्वेष रूपी पाश का छेदन कर साधु को मुक्त रूप से विहार करने का प्रयास करना चाहिए। साधु को भी अपने जीवन में जितना संभव हो सके, राग-द्वेष व स्नेह के भाव को छोड़कर अलिप्त रूप में रहने का प्रयास करना चाहिए।
जैन विश्व भारती द्वारा मुनि जयकुमारजी की कृति ‘उसको’ पुस्तक को आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित किया गया। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में छठे प्रेक्षाध्यान इण्टरनेशनल कन्वेंशन का मंचीय उपक्रम भी रहा। इस संदर्भ में प्रेक्षा इण्टरनेशनल के अध्यक्ष श्री अरविंद संचेती व मंत्री श्री गौरव कोठारी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने इस अवसर पर मंगल आशीष प्रदान करते हुए कहा कि प्रेक्षाध्यान से जुड़ी हुई चार केन्द्रीय संस्थाएं हो जाती हैं। प्रेक्षा इण्टरनेशनल का कार्य क्षेत्र विश्व में फैला हुआ है। इसके कार्यकर्ता बाहर जाते भी हैं। यह प्रेक्षा इण्टरनेशनल का चुनावी समय भी है। अच्छा कार्य होता रहे।

