
सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
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लाडनूं, विनय व्यवहार कौशल का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सूत्र है। जहां सामुदायिक जीवन होता है, वहां पारस्परिक व्यवहार में विनय होने से चित्त समाधि बनी रहती है और व्यक्ति का आचरण प्रशस्त व गरिमामय बन जाता है। आत्मा और जीवन की दृष्टि से आंतरिक सुंदरता ही मुख्य होती है। उपरोक्त विचार युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने ‘उत्तराध्ययन’ आगम के प्रथम अध्ययन के सूक्त का विवेचन करते हुए फरमाएं।
गुरूदेव ने आगे कहा कि एक श्रेष्ठ व्यक्तित्व वही है जिसके व्यवहार में तीन प्रमुख तत्व समाहित हों, व्यवहार में सौंदर्य, व्यवहार में माधुर्य और व्यवहार में गांभीर्य। बाहरी रूप-रंग क्षणभंगुर पुद्गल है, किंतु जब कोई व्यक्ति उच्छृंखलता और कटुता त्यागकर मधुर व शालीन भाषा का प्रयोग करता है और बड़ों के प्रति हाथ जोड़कर उचित लोकोपचार व सम्मान रखता है, तो उसके व्यवहार में सत्यम शिवम सुंदरम का वास्तविक दर्शन होने लगता है।
आचार्य प्रवर ने ‘गांभीर्य’ की महत्ता को गहराई से समझाते हुए कहा कि जिस प्रकार पर्वत में उच्चता और सागर में गहराई होती है, उसी प्रकार एक मनस्वी व्यक्ति के ज्ञान और चिंतन में पूर्ण गंभीरता होनी चाहिए। किसी भी संगठन के मुखिया या सामान्य व्यक्ति को कभी भी आवेश, उतावलेपन या कोरी भावुकता में आकर कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए, बल्कि शांति, धैर्य और विवेक से नियंत्रित होकर गहरा चिंतन करना चाहिए। आगमकार कहते हैं कि जो मेधावी और विनीत शिष्य विनय पद्धति के प्रति समर्पित होता है, उसकी सुगंधी और कीर्ति पूरे लोक में फैलती है तथा वह अन्य प्राणियों के लिए पृथ्वी के समान आधारभूत व शरण बन जाता है। हमारी विनय पद्धति का यह सुसंस्कृत प्रोटोकॉल है कि दीक्षा पर्याय में छोटे संत अपने से बड़े संतों के पास जाकर खमतखामना व वंदना करें। जीवन में मार्दव, गांभीर्य और वाणी के संयम से स्वयं को विभूषित करने वाला विनीत शिष्य वास्तव में धन्य होता है।
- आचार्य प्रवर के लाडनूं प्रवास में साधु साध्वियों की संख्या भी निरंतर वर्धमानता को प्राप्त कर रही है। कई क्षेत्रों से चारित्रआत्माओं के सिंघाड़े गुरू चरणों में पहुंच रहे है। आज भी नोखा एवं हिसार से विहार कर साध्वियां जैन विश्व भारती में योगक्षेम वर्ष में सम्मिलित होने गुरू चरणों में पहुंची। इसी संदर्भ में प्रवचन के उपरांत नोखा चातुर्मास सुसंपन्न कर गुरुकुलवास में पहुंची “शासन गौरव” साध्वी श्री राजीमती जी ने अपने भावों की अभिव्यक्ति दी। सहवर्ती साध्वियों ने गीत का संगान कर गुरू दर्शन के आल्हाद को प्रकट किया। इस अवसर पर नोखा एवं निकट क्षेत्रों से श्रावक समाज भी बड़ी संख्या में उपस्थित था। नोखा वासियों ने वक्तव्य एवं गीतिकाओं द्वारा प्रस्तुति दी।

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