
सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
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लाडनूं,शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में जैन विश्व भारती की सुरम्य धरा पर ज्ञान और तप की अविरल गंगा प्रवाहित हो रही है। गुरुदेव की सन्निधि में आज साधुओं के 10 दिवसीय प्रेक्षाध्यान शिविर का समापन हुआ। इससे पूर्व दिनांक 1 से 10 मार्च तक साध्वियों का प्रेक्षाध्यान शिविर समायोजित हुआ था। यह प्रथम बार है जब पूज्य प्रवर की मंगल सन्निधि में इस प्रकार से केवल साधु साध्वियों हेतु विशेष शिविर समायोजित हुए है। इस संदर्भ में मुनि धर्मेश कुमार जी, मुनि कुमारश्रमण जी, मुनि जय कुमार जी, मुनि ध्रुव कुमार जी ने अपने विचार व्यक्त किए। साध्वी श्री शुभ्रयशा जी ने भावभीव्यक्ति दी।
आज के इस अवसर पर जैन विश्व भारती मान्य विश्वविद्यालय के अनुशास्ता युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सन्निधि में विश्व विद्यालय के 36 वें स्थापना दिवस समारोह का भी आयोजन हुआ। यह प्रथम सुअवसर जैन विश्व भारती संस्थान को प्राप्त हुआ जब स्थापना दिवस पर अनुशास्ता की सन्निधि प्रत्यक्ष रूप में प्राप्त हो रही हो। इस मौके पर मुमुक्षु बहनों ने गुरू वंदना एवं विश्व विद्यालय की छात्राओं ने स्वागत गीत का संगान किया। जैविभा विश्व विद्यालय के कुलपति प्रोफेसर बछराज दुगड, जैविभा के अध्यक्ष श्री अमरचंद लुंकड़ ने विचारों की अभिव्यक्ति दी। मुख्यमुनि श्री महावीर कुमार जी एवं मुनि कुमारश्रमण जी का सारगर्भित उद्बोधन हुआ। कुलसचिव ने आभार व्यक्त किया। इस दौरान जीवन गौरव सम्मान, श्रेष्ठ सेवा सम्मान, विद्या निधि एवं सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी सम्मान भी प्रदान किए गए।
स्थापना दिवस के संदर्भ में फरमाते हुए अनुशास्ता ने कहा
ज्ञान प्राप्ति एक ‘सारस्वत साधना’ है। विद्यार्थी केवल अर्थोपार्जन तक सीमित न रहकर संस्कारवान और आत्मनिर्भर बनें। गुरुदेव ने संस्थान को निरंतर नई ऊँचाइयां छूने की प्रेरणा दी। साथ ही, वर्तमान वैश्विक युद्धों के परिप्रेक्ष्य में उन्होंने विश्वविद्यालय के ‘अहिंसा एवं शांति विभाग’ का आह्वान किया कि वह केवल अध्ययन व शोध तक सीमित न रहे, बल्कि विश्व-शांति और युद्ध-विराम के लिए अपने व्यावहारिक सुझाव वैश्विक पटल पर भेजे, जो संपूर्ण मानवता के लिए एक ऐतिहासिक अवदान होगा।
सुधर्मा सभा में चतुर्विध धर्मसंघ को संबोधित करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण जी ने फरमाया कि विवेक ही धर्म है। कहाँ बोलना है, कहाँ मौन रखना है, कब उपवास करना है, कब नहीं करना है इन सबमें साधक का विवेक जागृत रहना चाहिए। जो कार्य जिस समय करने का हो, उसे उसी समय संपन्न करने का प्रयास करना चाहिए। दिनचर्या में उठने और सोने का समय मोटा-मोटी निर्धारित होना चाहिए। यदि संगठन का मुखिया या आचार, नियम और मर्यादा में पूर्ण जागरूक रहता है, तो पीछे वालों को भी स्वतः प्रेरणा मिलती है। ठीक वैसे ही जैसे कमीज़ का ऊपर वाला बटन सही लग जाए, तो नीचे के सारे बटन अपने आप सही लग जाते हैं।
समय प्रबंधन की कला को समझाते हुए आचार्यश्री ने जैन सिद्धांत ‘केवली समुद्घात’ का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार केवली सीमित समय में विपुल कर्मों का क्षय करने के लिए समुद्घात करते हैं, उसी प्रकार व्यक्ति को भी अपने सीमित समय में अधिकतम कार्यों को व्यवस्थित करना चाहिए। जब कार्य अधिक हो और समय कम हो, तो गुरुदेव ने एचपीएस का प्रभावी सूत्र दिया। एच से Happiness अर्थात् कार्य के बोझ में भी तनाव न पालें और भीतर पूर्ण प्रसन्नता बनाए रखें। पी से Priority अर्थात् कार्यों की प्राथमिकता तय करें और सबसे आवश्यक कार्यों को पहले संपन्न करें, तथा एस से Sacrifice अर्थात् आवश्यकता पड़ने पर अपनी सुविधाओं जैसे नींद, एक समय का भोजन या अन्य कुछ बलिदान कर समय निकालें। जो कार्य जिस समय करने का हो, उसे उसी समय संपन्न करने वाला व्यक्ति ही जीवन और साधना के पथ पर सच्ची सफलता प्राप्त करता है।

