
सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
Key Line Times
*09.03.2026, सोमवार, लाडनूं, योगक्षेम वर्ष के तहत जैन विश्व भारती में युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में ज्ञान और अध्यात्म की अविरल गंगा प्रवाहित हो रही है। आज के मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में आचार्य श्री ने अपनी अमृतवाणी से जनमेदिनी को पावन पाथेय प्रदान किया। इस विशिष्ट अवसर पर जैन विश्व भारती और जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय की ओर से डॉ. समणी शशिप्रज्ञा जी द्वारा संकलित और संपादित ‘जैन दृष्टांत कोष’ भव्य विमोचन किया गया तथा इसे गुरुदेव के श्रीचरणों में समर्पित किया गया।
मंगल प्रवचन में पूज्य गुरूदेव आचार्य श्री महाश्रमण जी ने ‘स्पष्टभाषिता’ के विषय पर प्रवचन देते हुए फरमाया कि मनुष्य का जीवन उज्ज्वल भी हो सकता है और उसमें कभी प्रमादवश धब्बे भी लग सकते हैं। साधु भी छद्मस्थ इंसान है, अतः उससे भी गलती होना असंभव नहीं है। परंतु सबसे उत्तम बात यह है कि गलती होने पर व्यक्ति बिना किसी के पूछे, स्वयं अपने अनुशास्ता या प्रायश्चित दाता के पास जाकर अपनी भूल स्वीकार करे और प्रायश्चित करे। जीवन में भूल हो जाए तो उसे सुधारने का संकल्प लें और यह भावना रखें कि जो गलती हो गई है, उसकी अब कभी पुनरावृत्ति न हो।
गुरुदेव ने अनुशास्ताओं और संगठनों को भी मार्गदर्शन देते हुए कहा कि किसी से कोई गलती हो जाने पर अंतिम निर्णय लेने में अधीरता नहीं दिखानी चाहिए। जैसे सर्जरी से पहले दवाई देकर सुधार का अवसर दिया जाता है, वैसे ही भूल करने वाले को सुधरने का मौका अवश्य मिलना चाहिए। इसके साथ ही, आचार्य श्री ने ‘आलोयना’ (प्रायश्चित/दोषों की स्वीकृति) के महत्व को समझाते हुए कहा कि जिस प्रकार एक बच्चा अपने माता-पिता के सामने सरलता से अपनी बात कह देता है, वैसी ही शिशु जैसी सरलता आलोयना में होनी चाहिए। विशेषकर जीवन के अंतिम समय या संथारे से पूर्व व्यक्ति को अपने जीवन भर के ज्ञात-अज्ञात दोषों की किसी बहुश्रुत या गुरु के समक्ष समग्र रूप से आलोयना अवश्य कर लेनी चाहिए, ताकि आत्मा पूर्णतः शुद्ध हो सके।
तत्पश्चात कार्यक्रम में साध्वी मुदितयशा जी और साध्वी श्रुतयशा जी ने ‘शुक्ल पाक्षिक व कृष्ण पाक्षिक’ तथा ‘परीत व अपरीत संसारी’ जैसे आगमिक विषय पर संयुक्त प्रस्तुति दी। डॉ. समणी शशिप्रज्ञा जी ने अपने उद्गार व्यक्त किए। इसी क्रम में आठ चतुर्मासों की सुदीर्घ यात्रा पूर्ण कर लौटीं साध्वी संगीतश्री जी ने भावभीव्यक्ति देते हुए सहवर्ती साध्वियों के साथ गीतिका का गान किया।

