
सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर
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छोटी खाटू, डीडवाना-कुचामण (राजस्थान),छोटी खाटू की धरा पर प्रथम तथा जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ का 162वां मर्यादा महोत्सव का शुभारम्भ माघ शुक्ला पंचमी अर्थात् बसंत पंचमी (सरस्वती पूजा) से प्रारम्भ होगा। इसके लिए जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी विशाल धवल सेना के साथ छोटी खाटू में पधार गए हैं। आचार्यश्री का यहां मर्यादा महोत्सव सहित दस दिवसीय प्रवास निर्धारित है। इस कारण छोटी खाटू में मानों श्रद्धालुओं का ज्वार उमड़ आया है। पूरे गांव में किसी विशाल मेले जैसा दृश्य दिखाई दे रहा है।
ऐसे मर्यादा के महामहोत्सव से पूर्व गुरुवार को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान आध्यात्मिक गुरु आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघचालक श्री मोहन भावगत पहुंचे, तो पूरे छोटी खाटू में गजब-का माहौल देखने को मिला। भारत राष्ट्र के दो महान व्यक्तित्वों का मिलन जन-जन को आह्लादित करने वाला था।
गुरुवार को छोटी खाटू में मर्यादा महोत्सव के लिए विराजमान तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सर संघचालक श्री मोहन भावगत भी पहुंचे। वे छोटी खाटू में आयोजित मर्यादा महोत्सव के अंतर्गत आचार्यश्री के दर्शनार्थ उपस्थित थे। हालांकि वे प्रत्येक वर्ष आचार्यश्री के दर्शनार्थ उपस्थित होते रहते हैं।
मर्यादा समवसरण में युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के पहुंचने के कुछ समय पश्चात ही आरएसएस प्रमुख श्री मोहन भागवत आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में पहुंचे। उन्होंने आचार्यश्री को वंदन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया और मंचस्थ हुए। आरएसएस प्रमुख के आगमन से आज के मंगल प्रवचन कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छोटी खाटू तथा आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में आरएसएस के कार्यकर्ता भी उपस्थित थे।
युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के उपरान्त जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के अध्यक्ष तथा मर्यादा महोत्सव व्यवस्था समिति- छोटी खाटू के अध्यक्ष श्री मनसुखलाल सेठिया ने स्वागत वक्तव्य को प्रस्तुति देते हुए सरसंघचालक महोदय का स्वागत भी किया।
महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित विशाल जनमेदिनी को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि भारत में प्राचीन ग्रन्थों का भण्डार है। उनसे अच्छी वाणियां भी मिलती हैं। ये अच्छी वाणियां भी अपने आप में रत्न होती हैं। शास्त्र में कहा गया है कि धरती पर तीन रत्न हैं- पानी, अनाज और सुभाषित। अच्छी वाणी भी एक रत्न होती है। इन कल्याणी वाणियों से जीव का कल्याण भी हो सकता है। इन वाणियों को अच्छे ढंग से समझाने वाले सद्गुरु मिल जाते हैं, तो एक सुन्दर मार्गदर्शन प्राप्त हो सकता है। भारत का सौभाग्य है कि भारत की भूमि पर कितने-कितने संत हुए हैं। उन संतों की वाणी सुनने का अवसर मिले तो वर्तमान जीवन के साथ आगे जीवन को सुन्दर बनाने वाली होती है। अध्यात्म जगत में साधना के द्वारा सच्चाई का शोध और सच्चाई की प्राप्ति हो सकती है। देखकर, सुनकर भी ज्ञान प्राप्त होता है और कुछ ज्ञान इन्द्रियों की सहायता से प्राप्त होता है, जो परोक्ष ज्ञान होता है।
कल अर्थात बसंत पंचमी से त्रिदिवसीय मर्यादा महोत्सव का शुभारम्भ होगा। आदमी अपने अनुशासन-मर्यादा में रहे। राजतंत्र हो अथवा लोकतंत्र, प्रत्येक शासन में मर्यादा-अनुशासन की आवश्यकता होती है। साधु का धर्म सहन करना होता है, लेकिन जहां देश की रक्षा और सुरक्षा की बात आए तो वहां कड़ाई अथवा कोई कार्यवाही भी आवश्यक होती है। हालांकि उस कड़ाई में भी शांति की स्थापना मूल में होती है। आज मोहनजी भागवतजी का आना हुआ है। बहुत अच्छी बात है, आगे जैन विश्व भारती भी है।
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भावगत ने अपने अभिभाषण में कहा कि परम श्रद्धेय आचार्यप्रवर! हम लोग जो लाठी चलाते हैं, वह क्यों चलाते हैं, इस बात स्मरण रखने के लिए ही आप जैसे संतों के पास आता हूं। मनसुखजी हमारे संघ में संघचालक है और आज यहां एक्स्ट्रा आना हुआ है, वह मेरा एक्स्ट्रा लाभ है। जैसा आचार्यश्रीजी ने बताया वहीं भारत का कार्य है दुनिया को मर्यादा सीखाना। पुस्तक में बात लिखी हुई है, लेकिन उससे बात पूरी नहीं होती। उसको अपने आचरण से बताने का कार्य भारत करता है। धर्म के पीछे तो सत्य है, उसे हमारे पुर्वज जानते हैं, बाहर के देशों में लोग यह नहीं जानते। इसलिए दुनिया को इस सत्य का पता नहीं होता। कानून एक स्थान तक होता है, आगे का निर्णय धर्म ही करता है। श्री भागवत ने महाराजा शिवि की कथा का वर्णन करते हुए कहा कि भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जो सभी देशों की मदद को आगे बढ़ता है, बिना किसी स्वार्थ के। भारत धर्म को जानता है। व्यवहार का संतुलन व अनुशासन भारत जानता है। जीवन को अच्छा बनाने के लिए त्यागी संतों की सन्निधि में उपस्थित होना होता है। मेरे यहां बार-बार आने का एकमात्र कारण है कि आचार्यश्रीजी की सन्निधि में पहुंचकर आंखें खुल जाती हैं। मैं पुनः आचार्यश्रीजी को वंदन करता हूं।
मंगल प्रवचन कार्यक्रम के उपरान्त श्री भागवतजी और आचार्यश्री का विभिन्न विषयक वार्तालाप का भी क्रम रहा। दो महापुरुषों का मिलन छोटी खाटूवासियों के लिए और अधिक उत्साहवर्धक रहा।

