सुरत, गुजरात के सुरत मे
एक साथ 1500 से अधिक भाई बहनों ने किया आयंबिल तप जैन परंपरा में तप का विशेष महत्व रहा है। भगवान महावीर ने मोक्ष के चार मार्ग बताए हैं : ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप। इन चारों मार्गो में सबसे कठिन है तप।
तप के भी अनेक प्रकार हैं, उसमें से एक है आयंबिल तप। आयंबिल तप में तपस्वी को किसी भी एक ही प्रकार के धान्य के द्वारा एकासन व्रत करना होता है। एक स्थान पर बैठकर एक ही बार में आहार करना होता है और वह भी केवल एक ही प्रकार के धान्य द्वारा बनी हुई वस्तुओं का भोजन में उपयोग किया जा सकता है। जैसे कि धान्य में गेहूं का चयन किया है तो गेहूं की रोटी, खाखरा, घूघरी आदि (उबले हुए या सीके हुए रूप में) लिया जा सकता है। उसमें नमक का भी उपयोग नहीं होता है। घी, तेल, मिर्च, मसाला, सब्जी आदि कुछ भी साथ में नहीं लिया जा सकता। अन्य किसी भी पदार्थ का उपयोग करना नहीं होता है। इस प्रकार के आयंबिल तप की साधना महान कर्म निर्जरा का साधन बनती है। संयम विहार में महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी के मंगल सान्निध्य में आज एक साथ 1500 से अधिक तपस्वी भाई बहनों ने आयंबिल तप अनुष्ठान में भाग लिया और सूरत के तेरापंथ जैन धर्मसंघ के इतिहास में तपस्या के क्षेत्र में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है।

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